बेगम हामिदा हबीबुल्ला का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वह बोलता हुआ इतिहास थी। लगभग १०२ वर्ष की उम्र में दुनिया छोड़ने वाली बेगम हबीबुल्ला के पास बैठ जाओ तो वक्त कब बीत गया इसका पता नहीं चलता था। अलबत्ता बातें आगे के लिए फिर बाकी रह जाती थीं।
आजादी के आंदोलन की चश्मदीद ही नहीं बल्कि भुक्तभोगी थी। राजधानी के कई नामी कॉलेजों खासतौर से लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल-कॉलेजों की स्थापना में उनका काफी योगदान रहा है। कामकाजी महिलाओं की मदद को ‘सेवा’ (सेल्फ एंप्लायड वीमेंस एसोसिएशन) नाम की संस्था की स्थापना उन्होंने ही की थी।
वह स्व. इंदिरागांधी की दोस्त थी। हबीबुल्ला के पति ई. (इनायत) हबीबुल्ला ने ही सेना में मेजर जनरल रहते हुए पुणे में नेशनल डिफेंस अकादमी की स्थापना कराई थी। देश के मुख्य सूचना आयुक्त रहे वजाहत हबीबुल्ला बेगम के ही पुत्र हैं।
राजधानी में होली और दिवाली के पर्वों पर बेगम की ढोलक बजाते हुए सहेलियों के साथ महफिलों को गुलजार बनाना उनकी आदत में शुमार था। हबीबुल्ला राजधानी के पास बाराबंकी की हैदरगढ़ सीट से कई बार विधायक भी चुनी गई। वह प्रदेश सरकार में मंत्री भी रही और बाद में कॉंग्रेस से राज्यसभा भी भेजी गई। महिला कॉंग्रेस की भी वह अध्यक्ष रहीं।
बेगम ने वर्ष 2013 में ‘अमर उजाला’ से बातचीत में बताया था, ‘ वर्ष 1921 में पांच साल की उम्र में जब एक स्कूल से लौट रही थी कि रास्ते में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो और देश वालों विदेशी सामान जला दो ’ आवाजें कान में पड़ी। पता नहीं कहां से मेरे अंदर भी कुछ जलाने का भाव आ गया, और तो कुछ मिला नहीं, सिर पर लगी कैप जरूर विदेशी थी।
एक जगह जल रही आग में मैने भी अपनी कैप उतारकर बग्घी में बैठे-बैठे सडक़ पर जल रही आग में फेंक दिया। घर आई तो खूब डाट पड़ी। दादा निजामुद्दीन हसन अंग्रेजों के नजदीकी थे। नाराज हुए और मुझे मेरे वालिद जो उस समय हैदराबाद में मुख्य न्यायाधीश थे, के पास भेज दिया। पर, उस दिन गांधी से लगाव और अंग्रेजों के विरोध की जो लौ जली। वह फिर बुझ नहीं पाई।’