इन दिनों उन्नाव का जो डौडिया खेड़ा खजाने की खुदाई की वजह से सुर्खियों में है, वहां एक समय इतिहास का बड़ा हिस्सा दफन हो सकता था।
वहां चीनी यात्री ह्वेनसांग ठगों के हाथ पड़ कर दुर्गा मां को बलि चढ़ने से बचा था। यह वही ह्वेनसांग है, जिसने न सिर्फ भारत बल्कि एशिया के इतिहास के बारे में कई बेशकीमती जानकारियां दी हैं।
ह्वेनसांग ने यहां की सभ्यताओं, जगहों और शिक्षा पर काफी शोध किया था और आज दुनिया उसे अचूक इतिहास के रूप में पढ़ती है।
इतना ही नहीं, यह डौडिया खेड़ा सातवीं शताब्दी तक ‘हयमुख’ नामक बौद्ध केंद्र हुआ करता था। विश्व के जाने माने पुरातत्ववेत्ता अलेक्जेंडर कनिंघम के हवाले से यह दावा अंबेडकर महासभा का है।
साथ ही कहा गया है कि इस स्थल की खोदाई में जो भी सामग्री मिल रही है वह बौद्ध धर्म व संस्कृति केअवशेष हैं। सरकार को उसका संरक्षण करना चाहिए।
ह्वेनसांग का यहां आना साबित करता है कि डौडिया खेड़ा प्राचीन समय से यात्रियों के आकर्षण का केंद्र रहा है। ऐसे में बहुत संभव है कि सैकड़ों वर्षों के दौरान यहां यात्री आते रहे हों और उनके दान-दक्षिणा से खजाना बनता गया।
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हाल में प्रकाश में आए केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर के खजाने को लेकर भी कहा जा रहा है कि यहां आए यात्रियों के दान ने इसे समृद्ध किया है।
ऐसे में डौडिया खेड़ा पर अंबेडकर महासभा के अध्यक्ष डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने कहा कि एएसआई को जल्दबाजी केबजाय धीरे-धीरे खोदाई करनी चाहिए और यहां मिली हर सामग्री का विस्तृत विश्लेषण होना चाहिए।
एससी गौतम और जगत नारायण ने कहा कि प्रदेश के प्रमुख इतिहासकार प्रो. अंगने लाल ने डौडिया खेड़ा के बारे में विस्तार से लिखा है। यह शोध मानव संसाधन विकास मंत्रालय के वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग ने उप्र हिंदी संस्थान के साथ ‘उत्तर प्रदेश के बौद्ध केंद्र’ नाम से प्रकाशित करवाया है।
इसमें प्रो. अंगने लाल ह्वेनसांग के लेखों में दी गई जानकारी के आधार पर बताते हैं कि डौडिया खेड़ा दरअसल एक बौद्ध केंद्र था। अंग्रेज पुरातत्ववेत्ता एलेक्जेंडर कनिंघम ने हयमुख की डौडिया खेड़ा के रूप में पहचान स्थापित की।
वहीं, ह्वेनसांग जब हयमुख नगर आया तो पास के गांव के जंगल में उसे ठगों ने पकड़ लिया। वे दुर्गा माता के सामने उसकी बलि देने की तैयारी में थे, लेकिन वह किसी तरह बच निकला। बौद्ध भिक्षुओं तेजांकर दीप महाथेरा की एएसआई से शिकायत है कि वह बौद्ध स्थलों की खोदाई करने से बचता है।
वीरेंद्र कुमार मौर्य का कहना है कि यह जगह अंतरराष्ट्रीय धरोहर है, इसलिए इसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया जाए।
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