लखनऊ। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में मंगलवार को राजभाषा हिंदी उत्सव के तहत ‘हिंदी के विकास में बोलियों का योगदान : वर्तमान परिप्रेक्ष्य एवं भविष्य की दिशा’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि पद्मश्री वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विद्या विंदु सिंह ने कहा कि हिंदी की सामाजिकता और समावेशी प्रकृति ने उसे लगातार समृद्ध किया है। उन्होंने कहा कि हिंदी और उसकी बोलियों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता।
संगोष्ठी का आयोजन हिंदी प्रकोष्ठ, हिंदुस्तानी एकेडमी, प्रयागराज और अखिल भारतीय साहित्य परिषद, अवध प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। विवि के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि अवधी, भोजपुरी, ब्रज, बुंदेली और मैथिली जैसी लोकभाषाओं ने हिंदी के शब्द भंडार, साहित्य और लोकसंस्कृति को व्यापक बनाया है। डीसीएसके पीजी कॉलेज, मऊ के प्राचार्य प्रो. सर्वेश पांडेय ने तत्सम-तद्भव शब्दों के महत्व पर प्रकाश डाला। इस मौके पर विद्यार्थियों ने नुक्कड़ नाटक के माध्यम से हिंदी और बोलियों के पारस्परिक संबंध को प्रस्तुत किया।