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हाईकोर्ट ने 'मीट लाइसेंस' पर मचे बवाल पर यूपी सरकार से मांगा जवाब

Tue, 28 Mar 2017 07:50 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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कोर्ट - फोटो : amar ujala
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने मीट लाइसेंस रिन्यू न किए जाने और मीट की दुकानों के बंद होने पर मंगलवार को यूपी सरकार और नगर निगम से जवाब मांगा है। जवाब दाखिल करने के लिए कोर्ट ने 3 अप्रैल तक का वक्त दिया है।
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गौरतलब है कि यूपी सरकार ने अवैध कत्लखानों पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे कि बड़ी संख्या में इससे जुड़े कारो‌बारियों पर असर पड़ रहा है। इसके एक दिन पहले सोमवार को भी छोटे मीट विक्रेताओं द्वारा 2015 में दायर की गई याचि‌का पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने नगर निगम को फटकार लगाते हुए जवाब मांगा था।

प्रदेश में प्रमुख मुद्दा बन चुके मांस बिक्री से जुड़े इस मामले में याचिकाकर्ताओं के वकील गिरीश चंद्र सिन्हा ने बताया था कि लखनऊ में मांस के 412 छोटे विक्रेताओं को नगर निगम द्वारा हर वर्ष लाइसेंस जारी होता है। इसके लिए 300 रुपये फीस ली जाती है। यह काम अधिकतर विक्रेता पुश्तों से कर रहे हैं।
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नगर निगम की पशुवधशाला में वे बकरी, भैंस, सुअर ले जाते थे, जहां पशु चिकित्सक जांच करके उन्हें वध के लिए सही बताकर काटने की अनुमति देता था। इनका मांस ले जाकर विक्रेता अपनी दुकानों पर बेचते थे। लेकिन मार्च 2015 के एनजीटी के आदेश के बाद इसे बंद कर दिया गया। ऐसे में विक्रेताओं के 2014 के लाइसेंस एक्स्पायर होने के बाद नगर निगम ने भी मांस बिक्री के लिए लाइसेंस देना बंद कर दिया।
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नगर निगम का कहना था, वध नहीं तो लाइसेंस कैसा

याचिकाकर्ताओं से कहा जाने लगा कि जब पशुवध नहीं हो रहा है तो बेचने का लाइसेंस कैसे जारी करें? सिन्हा ने बताया कि इसे लेकर 2015 में यह याचिका दायर की गई थी।

नगर निगम का नियम है कि कोई भी विक्रेता बिना लाइसेंस मांस नहीं बेच सकता, दूसरी ओर पशुवध नगर निगम करवाएगा। ये दोनों ही बातें नहीं हो रही है।

हाईकोर्ट का निर्णय
मामले पर जस्टिस अमरेश्वर प्रताप साही और जस्टिस संजय हरकौली ने नगर निगम से पूछा कि जब पशुवध का अधिकार उसके पास है तो उसे ही निर्णय लेना है। दो वर्ष लाइसेंस जारी नहीं हुए, कोई निर्णय नहीं लिया गया। अब तक लाइसेंस क्यों जारी नहीं हुए इसका जवाब निगम को तीन अप्रैल को अगली सुनवाई पर देना होगा।
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