लखनऊ। किसान पथ पर हुआ हादसा सिर्फ एक दिन की त्रासदी नहीं है... शहर हादसों के ऐसे झटकों से कराह उठा है। सड़कें मानो रफ्तार के आतंक के हवाले कर दी गई हैं और प्रशासन सिर्फ कागजों पर ट्रैफिक सुधार का ढोल पीटता दिख रहा है।
एक दिन पहले ही चारबाग के सामने रोडवेज बस ने उन्नाव की संगीता को उनके बेटे के सामने कुचल दिया था... तीन बच्चों के सामने एक मां की मौत हो गई थी। उधर, इससे कुछ ही दिन पहले किसान पथ पर ही तेज रफ्तार ट्रक डिवाइडर फांदकर दूसरी लेन में चढ़ गया था और बरातियों से भरी बस से भिड़ गई थी। उस हादसे में 30 लोग घायल हुए थे। अब शनि की मौत ने शहर का गुस्सा फिर भड़का दिया है। सवाल सीधा है कि सिस्टम आखिर सो क्यों रहा है?
हैरानी यह है कि ये सभी हादसे तब हो रहे हैं जब शहर में यातायात माह अभी-अभी खत्म हुआ है। एक महीने तक जागरूकता, सुरक्षा और नियमों के पालन की बड़ी-बड़ी बातें होती रहीं। पोस्टर लगे, स्कूलों में भाषण हुए, चेकिंग अभियान की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डाली गईं, लेकिन सड़क पर इसका असर जीरो दिख रहा है। न तेज रफ्तार पर रोक है, न नशे में ड्राइविंग पर सख्ती, न डग्गामार वाहनों पर कार्रवाई और न हादसों वाले ब्लैक स्पॉट को ठीक करने की कोई कोशिश।
हादसे होते हैं, लोग मरते हैं, परिवार उजड़ते हैं और सिस्टम महज ‘जांच की जाएगी’ कहकर अगला हादसा होने का इंतजार करता रहता है।
ये सवाल और तीखे हैं—
पिछले महीने का ट्रैफिक अभियान सिर्फ दिखावा था क्या?
जागरूकता पोस्टरों में थी या जमीन पर भी उतरी?
चेकिंग सिर्फ कैमरों के लिए की गई थी?
और सबसे बड़ा सवाल... आैर कितनी जानें जाएंगी, तब जाकर जिम्मेदार विभाग सुधरेंगे?
शहर पूछ रहा है... सड़कें कब सुरक्षित होंगी?
चारबाग में ऐसे बेतरतीब वाहन अक्सर हादसों की वजह बनते हैं।
चारबाग में ऐसे बेतरतीब वाहन अक्सर हादसों की वजह बनते हैं।
चारबाग में ऐसे बेतरतीब वाहन अक्सर हादसों की वजह बनते हैं।
चारबाग में ऐसे बेतरतीब वाहन अक्सर हादसों की वजह बनते हैं।
चारबाग में ऐसे बेतरतीब वाहन अक्सर हादसों की वजह बनते हैं।
चारबाग में ऐसे बेतरतीब वाहन अक्सर हादसों की वजह बनते हैं।