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हाईकोर्ट ने कहा- गोपनीय रहे हाथरस कांड की जांच, देर रात अंतिम संस्कार मानवाधिकार का हनन

Wed, 14 Oct 2020 12:28 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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लखनऊ हाईकोर्ट
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हाथरस कांड में हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एडीजी कानून-व्यवस्था और डीएम की सफाई से असंतुष्टि जाहिर करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया है कि इस मामले में सभी जांचें पूरी तरह गोपनीय रखी जाएं। जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस राजन रॉय की पीठ ने कहा, इस मामले में ऐसा कोई भी व्यक्ति सुबूतों या अन्य मुद्दों को लेकर बयान नहीं देगा, जो सीधे जांच से नहीं जुड़ा है। इससे अफवाह और अनुमान पैदा होते हैं, जो दोनों पक्षों की कानून न समझने वाली भीड़ में भावनाओं को उभार सकते हैं। इस मामले की जांच करने वाली एसआईटी और सीबीआई अपनी कार्रवाई गोपनीय रखेगी।
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न्यायालय ने कहा कि जिस प्रकार अभियुक्तों को ट्रॉयल पूर्ण होने से पहले दोषी नहीं ठहराना चाहिए, उसी प्रकार किसी को पीड़िता के चरित्र हनन में भी संलिप्त नहीं होना चाहिए। अदालत ने सोमवार को सुनवाई के बाद मंगलवार को 11 पेज के आदेश में पीड़ित परिवार को कड़ी सुरक्षा देने का आदेश दिया है।

एसपी सस्पेंड तो डीएम क्यों नहीं
पीठ ने कोर्ट में मौजूद अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी से पूछा कि अगर मामले में एसपी को सस्पेंड किया गया तो, डीएम को क्यों नहीं? अंतिम संस्कार के मामले में डीएम की एक भूमिका थी तो क्या उन्हें हाथरस में बनाए रखना उचित है? इस पर अपर मुख्य सचिव ने भरोसा दिलाया कि सरकार मामले के इस पहलू को भी देखेगी और इस पर निर्णय लेगी।
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एडीजी को नसीहत... कानून में बदलाव के बाद भी दुष्कर्म पर ऐसा बयान?
पीठ ने कहा, एडीजी कानून-व्यवस्था ने कहा कि हाथरस प्रशासन ने अतिरिक्त सुरक्षाबल की मांग नहीं की थी। यदि मांग करते तो उन्हें अतिरिक्त पुलिस मुहैया कराई जाती।
-पीठ ने कहा, एडीजी प्रशांत कुमार दुष्कर्म कानून में संशोधन के बारे में जानते हैं, फिर भी उन्होंने सीमेन की अनुपस्थिति वाली फोरेंसिंक रिपोर्ट के आधार पर दुष्कर्म न होने का बयान दिया।
-हमने उनसे यह यह सवाल इसलिए किया था क्योंकि एडीजी-कानून-व्यवस्था और डीएम ने जांच से सीधे न जुड़े होने के बावजूद फोरेंसिक रिपोर्ट के हवाले से सार्वजनिक टिप्पणी की थी।
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कोर्ट ने डीएम के बयान को विरोधाभासी करार दिया

हाथरस मामले में हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा कि पीड़िता का देर रात अंतिम संस्कार कराना मानवाधिकार का हनन है। जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस राजन रॉय ने कहा- इस मामले में गरिमापूर्ण ढंग से अंतिम संस्कार के अधिकार का उल्लंघन किया गया। यह तय करना होगा कि इसका कौन जिम्मेदार है और पीड़िता के परिवार की क्षतिपूर्ति कैसे की जा सकती है। पीठ ने डीएम हाथरस प्रवीण कुमार लक्षकार से पूछा किया बिना परिवार की मंजूरी के शव रात में क्यों जलाया गया? कोर्ट ने डीएम के बयान को विरोधाभासी करार दिया।

पीड़िता के परिवार, अपर मुख्य सचिव, डीजीपी, एडीजी कानून व्यवस्था तथा हाथरस के डीएम को सुनने के बाद न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि तथ्यों से प्रतीत होता है कि मृतका का चेहरा दिखाने के परिवार के अनुरोध पर प्रशासन ने स्पष्ट रूप से इनकार नहीं किया होगा। हालांकि तथ्य यही है कि बार-बार के अनुरोध के बावजूद उनमें से किसी को भी चेहरा नहीं दिखाया गया। न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार गरिमापूर्ण ढंग से अंतिम संस्कार के अधिकार का उल्लंघन किया गया। पीड़ित परिवार, वहां मौजूद लोगों और रिश्तेदारों की भावनाओं को भी आहत किया गया।

न्यायालय ने टिप्पणी की, ‘आजादी के बाद शासन और प्रशासन का सिद्धांत ‘सेवा’ और ‘सुरक्षा’ होना चाहिए, न कि ‘राज’ और ‘नियंत्रण’, जैसा कि आजादी के पहले था। जिला स्तरीय अधिकारियों को ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए सरकार की ओर से समुचित प्रक्रिया व दिशानिर्देश मिलना चाहिए। भविष्य में ऐसा विवाद न उत्पन्न हो, इस बावत भी न्यायालय विचार करेगा।

मीडिया और राजनेताओं को भी ताकीद
पीठ ने मीडिया और राजनीतिक दलों को भी अनावश्यक बयानबाजी और अनुमान लगाने से बचने की ताकीद की। पीठ ने कहा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार में हमारे बाधा डालने की मंशा नहीं है, लेकिन मीडिया और राजनीतिक दलों से आग्रह है कि अपने विचार ऐसे पेश करें ताकि सामाजिक सौहार्द न बिगड़े और पीड़िता व आरोपी के परिजनों के अधिकारों का हनन न हो।

मां के बयान देते समय रोने का किया जिक्र
पीठ ने अपने आदेश में पीड़िता की मां का भी जिक्र किया और कहा कि मां ने अपनी बेटी का चेहरा दिखाने के लिए आग्रह करने की बात कही, लेकिन उसे मंजूर नहीं किया गया। उसकी इच्छा के खिलाफ शव को रात में जला दिया गया। मां जब अपनी बेटी के साथ कथित दुष्कर्म की घटना की तारीख से अब तक का सारा घटनाक्रम बताने लगी तो रोने लगी।
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