लखनऊ। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने अर्जुनगंज स्थित सेना की फायरिंग रेंज की जमीन पर अवैध कब्जों को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए 10 मार्च को प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। अदालत ने सभी पक्षकारों के वकीलों को मामले के महत्वपूर्ण तथ्यों और घटनाओं की विस्तृत सूची तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह आदेश ब्रिगेडियर तिरबनी प्रसाद की ओर से वर्ष 2011 में दाखिल याचिका पर दिया है। पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने शपथ पत्र के जरिये कोर्ट को बताया था कि अतिक्रमण के कारण सेना लंबी दूरी के हथियारों की ट्रेनिंग नहीं कर पा रही है। ऑपरेशन सिंदूर की पृष्ठभूमि में ट्रेनिंग का टलना राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य तैयारियों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
वहीं, अदालत ने पूर्व में टिप्पणी की थी कि सेना के अधिकारियों के बार-बार अनुरोध करने के बावजूद राज्य सरकार, जिला प्रशासन और एलडीए के अधिकारियों ने आंख-कान बंद रखे। इसी लापरवाही का नतीजा है कि आज सेना अपनी निर्धारित जमीन पर युद्धाभ्यास नहीं कर पा रही है।
इस पर पिछली सुनवाई में राज्य सरकार ने बताया था कि फायरिंग रेंज संबंधी मूल अधिसूचना की अवधि तीन वर्ष के लिए बढ़ा दी गई है। हालांकि, जिलाधिकारी की ओर से भेजे गए प्रस्ताव में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि फायरिंग रेंज का प्रभावी क्षेत्र घटाकर अब 121.339 हेक्टेयर कर दिया गया है।