माननीय से ज्यादा व्यस्त साहब
चुनाव नजदीक आ रहे हैं और इस लिहाज से व्यस्त तो माननीयों को होना चाहिए लेकिन उनसे ज्यादा बिजी साहब लोग हैं। खुद माननीयों का रोना है कि उनके फोन का जवाब नहीं मिलता। मिलता भी है तो काम चलाऊ। कुछ ऐसा हाल रोजगार, कारखानों से जुड़े विभागों का है। जहां व्हाट्सएप पर भी उनके ‘ओके’ का इंतजार करना पड़ रहा है। ऐसे ही दुखड़ा रोने वाले एक माननीय ने कहा कि यही हाल रहा तो लुटिया डुबोने में ये कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
साहब, मोर्चा लेने के लिए तलाश रहे लोग
प्रदेश का एक प्रमुख और पुराना विश्वविद्यालय इस समय अंदरुनी द्वंद से काफी जूझ रहा है। हालत यह है कि मुखिया अपने ही मातहतों से विभिन्न मुद्दों पर घिरे हुए हैं। अब जब उनके आदेश-निर्देश का ही अनुपालन नहीं हो पा रहा है तो वे ऐसे लोगों से मोर्चा के लिए के लिए लोगों की तलाश कर रहे हैं। इतना ही नहीं जो इससे इंकार कर रहा है, वह उनके कोप का भाजन भी बन रहा है। इसे लेकर परिसर के अंदरखाने में इसकी चर्चा शुरू हो गई है। वहीं मामला विश्वविद्यालयों के मुखिया तक पहुंच गया है।
खुद की जड़ हिल गई
पुलिस विभाग में बड़ा परिवर्तन किया गया। सात जिलों के कप्तान बदले गए। इसमें एक कप्तान ऐसे भी हैं, जो एक के बाद एक विवाद में फंसते जा रहे थे। कभी किसी प्रदर्शनकारी को पीटा तो कभी किसी नेता को। वह भी कैमरों के सामने। कथित सिंघम स्टाइल पुलिसिंग उनको भारी पड़ गई और जिले की कमान छीन ली गई। कप्तानी कम, नेतागिरी भी खूब कर रहे थे। इसलिए भाषण भी खूब चर्चित हुए। एक भाषण ये भी था कि मेरे पक्ष वाले एक पेड़ लगाएं और जो विरोध में हैं, दो पेड़ लगाएं। अब खुद की जड़ ही हिल गई।