प्रदेश में अधिकारियों का हैरान कर देने वाला एक कारनामा सामने आया है। शासन ने जो काम यूपी स्टेट कंस्ट्रक्शन एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डवलपमेंट कॉर्पोरेशन (यूपी सिडको) को जारी किए थे, उनके लिए स्वीकृत राशि दूसरी कार्यदायी संस्था उत्तर प्रदेश राज्य निर्माण एवं श्रम विकास सहकारी संघ लिमिटेड (सीएलडीएफ) को जारी कर दी गई। शासन की बिना मंजूरी दिए गए 10.53 करोड़ रुपये जब सीएलडीएफ से वापस मांगे गए तो जवाब मिला कि अधिकतर राशि खर्च हो चुकी है। अभी तक यूपी सिडको को 2 करोड़ 36 लाख 44 हजार रुपये ही वापस किए गए हैं।
यह मामला पकड़ में आने पर पिछले सप्ताह समाज कल्याण विभाग के संयुक्त सचिव भगवती प्रसाद को सस्पेंड कर दिया गया है। जबकि, इस मिलीभगत में शामिल अन्य अफसरों पर भी कार्रवाई की तैयारी है। इतना ही नहीं उनसे इस धन के भू-राजस्व की भांति वसूली पर भी विचार किया जा रहा है। ये काम अति पिछड़े, अनुसूचित जाति समूह बहुल ग्रामों के सर्वांगीण विकास के लिए संचालित एकीकृत विकास योजना से संबंधित हैं।
योजना के तहत गांवों में सीसी रोड, इंटरलॉकिंग रोड और नालियों का निर्माण कराया जाता है। शासन ने महराजगंज, बलरामपुर, गोंडा और सिद्धार्थनगर के 23 कार्यों का काम यूपी सिडको को जारी किया। इनकी कुल लागत 19.32 करोड़ रुपये थी। इन कार्यों के लिए 7.01 करोड़ रुपये यूपी सिडको को दिए गए और 3.86 करोड़ रुपये यूपीसीएलडीएफ को जारी कर दिए गए। यूपीसीएलडीएफ को द्वितीय किस्त के रूप में यह राशि जारी की गई। जबकि, नियमानुसार ऐसा नहीं हो सकता था।
रिकॉर्ड बताता है कि इस योजना के तहत मंजूर कई अन्य कामों में भी यही गड़बड़ की गई। इस तरह से कुल 10.53 करोड़ रुपये यूपी सिडको के स्थान पर यूपीसीएलडीएफ को जारी कर दिए गए। जब यूपीसीएलडीएफ से यह राशि वापस मांगी गई तो वहां से जवाब मिला कि अधिकतर राशि खर्च हो चुकी है। जिन कामों के लिए उसे यह राशि दी गई, उनमें से कई कार्य कराए जा चुके हैं।
यहां सवाल यह उठता है कि जिन कामों को कराने की जिम्मेदारी ही शासनादेश के माध्यम से यूपीसीएलडीएफ को नहीं दी गई, उसने ये काम कैसे करा दिए।
इस बारे में संपर्क किए जाने पर यूपी सिडको के एमडी शिव प्रसाद आनंद ने बताया कि जो राशि यूपीसीएलडीएफ से वापस ली जानी है, उसमें से कुल 2.36 करोड़ रुपये ही अभी तक यूपी सिडको को मिले हैं।