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दंगे की ‘सियासत’ में बिखर गया मुजफ्फरनगर

Wed, 19 Mar 2014 08:57 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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दंगे का दर्द, 15 हजार शरणार्थी और दिलों में नफरत की गहरी होती खाई। खेती-किसानी की पहचान रखने वाले गन्ना बेल्ट में कुछ ऐसी ही आबोहवा है।
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सौ करोड़ के मुआवजे का मरहम भी घाव नहीं भर पाया। सियासत कठघरे में है। विकास के मुद्दे पीछे छूट गए। कहने को यहां एशिया की सबसे बड़ी गुड़ मंडी है, लेकिन समस्याएं भी कम नहीं।

गन्ना किसान मुश्किल में हैं। सड़कें खस्ताहाल हैं। पता लगाना मुश्किल है कि गड्ढ़ों में सड़क है या सड़कों में गड्ढ़े। बिजली, पानी और कानून व्यवस्था की कमोबेश यही स्थिति है। जनता का सवाल है, आखिर सांसद करते क्या हैं?
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किसान सियासत का गढ़ है मुजफ्फरनगर

वेस्ट में किसान सियासत का गढ़ है मुजफ्फरनगर। इसका जब कहीं जिक्र होता है तो बड़ी शख्सियतें याद आती हैं, जिनमें एक हैं चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत और दूसरे शिक्षा ऋषि स्वामी कल्याण देव।

टिकैत ने 25 बरस तक किसान आंदोलनों की अगुवाई कर भाकियू का लोहा मनवाया। स्वामी कल्याण देव ने ग्रामीण क्षेत्र में 350 से ज्यादा शिक्षण संस्थाएं खोलकर इतिहास रचा।

छह माह पहले स्वर्णिम अतीत पर दंगे की कालिख लग गई। उन्माद की आग गांव-गलियों तक पहुंच गई। हिंसा में 65 से ज्यादा बेगुनाह मारे गए।

पीढ़ियों का सामाजिक ताना-बाना बिखर गया। 15 हजार दंगा पीड़ित आज भी अपने गांव नहीं लौटना चाहते। दिलों में ऐसी दूरियां बढ़ीं कि किसान-मजदूर का रिश्ता दरक गया।

दंगों के हालात में सब हो गए बेबस

भाकियू से अलग मुस्लिमों ने किसान-मजदूर मंच बना लिया। दंगे से ऐसे हालात बने कि जनप्रतिनिधि बेबस नजर आए। सियासी दल चाहे कोई हो, बदले समीकरण में भाईचारे के लिए प्रयास नाकाम रहे।

नफे-नुकसान के गणित में उलझी राजनीति में विकास की बातें पीछे छूट गईं। बात हो रही है तो सिर्फ धर्म और जाति की। रालोद का जाट-मुस्लिम समीकरण बिगड़ा तो छोटे चौधरी ने आरक्षण का दांव खेल दिया।

मुस्लिमों की खामोशी क्या गुल खिलाएगी, सियासतदां बेचैन हैं। दंगे के असर से गैर मुस्लिमों के एक साथ दिखने से भाजपा खुश है। लोकसभा चुनाव में किसानों का रुख कितना प्रभावी होगा, यह देखना बाकी है। बसपा के मौजूदा सांसद कादिर राना फिर से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

यह बात अलग है कि दंगों से जुड़े मुकदमों में उन्हें भी जेल जाना पड़ा। बीते पांच साल में सांसद ‘खास’ से ‘आम’ नहीं बन पाए। लोगों को यह भी मलाल है कि सांसद राना सिर्फ अपने वोट बैंक को संवारने में ही लगे रहे।

कैसे जाएं दूसरे शहर?

पानीपत-खटीमा राजमार्ग, मुजफ्फरनगर-सहारनपुर और मेरठ-करनाल सड़क मार्ग पूरी तरह टूट चुके हैं। शामली, सहारनपुर या हरियाणा के पानीपत और करनाल जाने के लिए यात्री सड़क मार्ग को भूल चुके हैं।

दिल्ली-देहरादून नेशनल हाईवे 58 भी मेरठ से मुजफ्फरनगर के बीच ही बन पाया है। चलती गाड़ियों में लूटपाट भी आम बात हो गई है।

बरसों से बदहाल सड़कों को लेकर किसान कई बार जाम और प्रदर्शन कर चुके हैं। खुद रालोद सांसद जयंत चौधरी ने बघरा से शामली तक पैदल मार्च किया था, लेकिन इस मार्ग के दिन नहीं फिरे।

क्यों गुस्से में हैं किसान?

जिले के गन्ना उत्पादकों का चीनी मिलों पर 8 अरब 58 करोड़ रुपये बकाया है। मिलों में इस बार पेराई भी डेढ़  माह देर से शुरू हुई।

गन्ना खेतों में खड़ा रहा तो किसान सड़कों पर आ गए। भाकियू के जिलाध्यक्ष राजू अहलावत कहते हैं जनप्रतिनिधियों को किसानों की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। संसद में किसानों की आवाज नहीं उठाई जाती।

भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत कहते हैं कि राजनीति ने किसान को सिर्फ वोट बैंक बनाकर रख दिया है। कोई भी पार्टी किसानों और गांव की उन्नति की बात नहीं करती।

बकौल टिकैत केवल दिखावा होता है, जबकि संसद और विधानसभा में किसानों का दर्द किसी को महसूस नहीं होता।
जब सरकारें ही उद्योगपतियों और दलालों के हाथों में खेलती हैं तो चीनी मिलें कैसे वक्त पर चलें।

दंगे ने कटवा दिए टिकट

मुजफ्फरनगर दंगे ने सियासत में ऐसा उलटफेर किया कि पार्टियों को प्रत्याशी बदलने पड़ गए। नगर विकास राज्यमंत्री चितरंजन स्वरूप के बेटे गौरव स्वरूप को डेढ़ साल पहले सपा ने प्रत्याशी घोषित कर दिया था।

हाल ही उनका टिकट काटकर बीज विकास निगम के अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री वीरेंद्र सिंह को पार्टी ने नया उम्मीदवार घोषित कर दिया। जिले की मीरापुर और पुरकाजी विधानसभा सीटें बिजनौर संसदीय क्षेत्र में आती हैं।

सपा ने पूर्व सांसद अनुराधा चौधरी को बदलकर पूर्व सांसद अमीर आलम को टिकट दिया था, लेकिन ऐन वक्त पर बिजनौर के पूर्व विधायक शाहनवाज राना को प्रत्याशी बनाया है।

जिला बार संघ के अध्यक्ष राजेश्वर दत्त त्यागी कहते हैं कि सांसद बीते पांच साल में केंद्र सरकार से जिले को कुछ नहीं दिला पाए। कानून व्यवस्था चरमराई हुई है। महज घोषणाएं ही मतदाताओं के हिस्से में आई हैं।

इन दोनों में होगी कड़ी जंग

कादिर राना (बसपा) : बसपा के मौजूदा सांसद कादिर राना फिर से प्रत्याशी है। एमएलसी और मोरना से रालोद विधायक रह चुके राना दूसरी बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं।
चुनावी मंत्र : विकास के नाम पर और दंगे के दंश को भुनाने की कोशिश।

डॉ संजीव बालियान (भाजपा) : डवलपर्स इंडस्ट्री से जुड़े हैं। विधानसभा चुनाव कभी नहीं लड़े। भाजपा ने पहली बार लोकसभा का प्रत्याशी बनाया है। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से वह क्षेत्र में सक्रिय हैं।
चुनावी मंत्र :  दंगों में फर्जी नामजदगी को मुद्दा बनाने की रहेगी कोशिश, विकास के साथ ही नरेंद्र मोदी के नाम का सहारा।

मुलायम ने इन्हें उतारा मैदान में

वीरेंद्र सिंह (सपा) : कांधला क्षेत्र के पूर्व विधायक एवं उत्तर प्रदेश बीज विकास निगम के अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह सपा प्रत्याशी। वर्ष 2012 में शामली विधानसभा से सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर दूसरे स्थान पर रहे थे।
चुनावी मंत्र : सपा सरकार की ओर से दंगा पीड़ितों को दी गई मदद और राज्य सरकार की उपलब्धियां।

सूरत सिंह वर्मा (कांग्रेस): बसपा को छोड़कर कांग्रेस में आए वरिष्ठ नेता सूरत सिंह वर्मा को पार्टी ने प्रत्याशी बनाया है। वह बसपा के टिकट पर यहीं से पहले चुनाव लड़कर तीसरे स्थान पर रहे थे।
चुनावी मंत्र : दंगों को लेकर राज्य सरकार और भाजपा को घेरने की कोशिश। विकास को लेकर भी राज्य सरकार को घेरने की कोशिश।
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विकास के नाम पर मांगेंगे वोट

सांसद निधि का पूरा पैसा जिले के विकास कार्यों पर खर्च किया गया है। मेरे प्रस्ताव पर रेल मंत्रालय ने मेरठ-टपरी लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दी।

650 करोड़ का बजट मंजूर हो गया है। जानसठ रोड और गांधी कॉलोनी में रेलवे ओवरब्रिज को मंजूरी दिलाई।

बुढ़ाना में सात और चरथावल क्षेत्र में 35/11 केवीए के बिजलीघर बनवाए गए। विकास के नाम पर जनता के बीच जाकर वोट मांगेंगे।
(कादिर राना, सांसद, मुजफ्फरनगर)
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