लखनऊ। शनिवार को 18 दिन के बच्चे को गोद में लेकर परिजन छह घंटे तक एक से दूसरे अस्पताल तक भटकते रहे। बच्चे को रेफर करने से पहले अस्पताल से एंबुलेंस तक नहीं मुहैया कराई गई। परिजन गोद में बचचे को लेकर ऑटो-रिक्शे से इधर-उधर दौड़ते रहे। कहीं भी वेंटिलेटर खाली न होने से बच्चे की जान सांसत में पड़ गई। थक हारकर परिजनों ने बच्चे की जान बचाने के लिए उसे निजी अस्पताल में भर्ती कराया।
आलमबाग टेढ़ी पुलिया निवासी बुजुर्ग मीनू के 18 दिन के पोते शिवोम की सांस शनिवार सुबह उखड़ने लगी। दादी सुबह करीब नौ बजे आलमबाग स्थित चंदरनगर अस्पताल की इमरजेंसी ले बच्चे को ले गईं। डॉक्टरों ने हालत गंभीर बताकर बच्चे को लोकबंधु अस्पताल रेफर कर दिया। लोकबंधु अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टराें ने जांच की। पीडियाट्रिक यूनिट में वेंटिलेटर खाली न होने पर केजीएमयू, लोहिया व बलरामपुर के लिए रेफर कर दिया।
दादी शिवोम को लेेकर दोपहर एक बजे बलरामपुर अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचीं। यहां पीकू यूनिट न होने का हवाला देकर डफरिन अस्पताल भेजा गया। डफरिन अस्पताल की बाल रोग यूनिट में पहले तो डॉक्टरों ने बच्चे को भर्ती करने में आनाकानी की। परिजनों ने विरोध जताया तो डाॅक्टर भर्ती के लिए राजी हुए। बाद में बताया कि वेंटिलेटर खाली नहीं है। बिना वेंटिलेटर बच्चे की जान जोखिम में पड़ सकती है। परेशान दादी बच्चे को आलमबाग के निजी अस्पताल में भर्ती कराया है।
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डफरिन के जूनियर डॉक्टर ने निजी अस्पताल का बताया रास्ता
डफरिन के जूनियर डॉक्टर ने बच्चे को वेंटिलेटर की जरूरत बताई। जूनियर डॉक्टर ने सरकारी में खाली न होने की बात कहते हुए बच्चे को ठाकुरगंज स्थित निजी अस्पताल ले जाने का रास्ता बताया। परिजन इस पर भड़क गए। इसके बाद डॉक्टर बैकफुट पर आ गए। डॉक्टर ने अपनी मर्जी से बच्चे को कहीं भी ले जाने की बात कही।
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सीएचसी से नहीं मिली एंबुलेंस
आलमबाग चंदरनगर सीएचसी से बच्चे को गंभीर हालत में रेफर करने से पहले डॉक्टर ने एंबुलेंस तक नहीं मुहैया कराई। यही स्थिति लोकबंधु अस्पताल में हुई। वहां भी बच्चे को एंबुलेंस नहीं मुहैया कराई गई, जबकि बच्चे को ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत थी। छह घंटे तक परिजन बिना ऑक्सीजन सपोर्ट के एक से दूसरे अस्पताल भटकते रहे।
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रेफरल पॉलिसी लागू न होने से जा रही जान
अस्पतालों में रेफरल पॉलिसी लागू न होने से आए दिन गंभीर मरीजों की जान जा रही है। डॉक्टर मरीज को रेफर करने से पहले संबंधित अस्पताल में बेड व वेंटीलेटर का पता तक नहीं कराते हैं। डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए सीधे पर्चे पर रेफर बनाकर भेज रहे हैं। दूसरे अस्पतालों में बेड-संसाधन खाली न होने पर गंभीर मरीज भटकते हुए जान गंवा देते हैं।