केस-वन बहराइच के जिला अस्पताल ने ननकू की गर्भवती पत्नी इन्द्रकली को भर्ती करने से मना कर दिया था। इस कारण इन्द्रकली को सड़क पर ही बच्चे को जन्म देना पड़ा।
इस मामले की 5 दिसंबर 2012 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत हुई थी। आयोग ने प्रदेश सरकार को इस पर कार्रवाई करने के लिए कहा था।
लगभग एक साल पुराने मामले में अब स्वास्थ्य विभाग ने प्रदेश के सभी चिकित्सालयों को इस पर कड़े निर्देश दिए हैं।
9 जनवरी 2014 को भेजे गए आदेश में सरकार ने कहा है कि गर्भवती महिलाओं को यदि अस्पतालों में भर्ती करने से मना किया गया तो दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
केस-2 राजकीय बाल गृह इलाहाबाद की तीन संवासनियों के साथ यौन उत्पीड़न करीब दो साल पहले हुआ था। इस मामले में बाल गृह के कर्मियों को ही दोषी पाया गया था।
मामले की शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में 24 अप्रैल 2012 को दर्ज हो गई थी। आयोग ने 12 अगस्त 2013 को पीड़ित संवासनियों को चार-चार लाख रुपये की एफडी देने के निर्देश महिला एवं बाल विकास विभाग को दिए थे।
इस मामले में भी नौ जनवरी 2014 को तीनों संवासिनियों की एफडी बनवाने के लिए 12 लाख रुपये जारी कर दिए हैं।
केस-3 राजकीय संप्रेक्षण गृह अयोध्या, फैजाबाद में निरुद्घ मोहम्मद वसीम उर्फ कालिया की हेपेटाइटिस-बी के कारण 13 सितंबर 2008 को मृत्यु हो गई थी।
इसमें पाया गया कि इलाज के लिए फैजाबाद के डॉक्टरों के जवाब देने के बाद लखनऊ लाने में देरी हुई। इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सात अगस्त 2013 को मारे गए युवक के परिजनों को एक लाख रुपये देने के आदेश दिए थे।
इसे भी पहले लटकाया गया। बाद में नौ जनवरी 2014 को महिला एवं बाल विकास विभाग ने उसके परिजनों को देने के लिए एक लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत कर दी।
प्रदेश सरकार को अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का डर सताने लगा है। सरकार ने विभागों को अपने यहां मानवाधिकार आयोग के आदेशों पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
इसका असर विभागों में दिखने भी लगा है। कई विभागों ने अरसे पुराने आयोग के आदेशों पर कार्रवाई करनी भी शुरू कर दी है। विभाग कार्रवाई करने के बाद आयोग को फैक्स के जरिए इसकी जानकारी भी दे रहे हैं।
लोकसभा चुनाव मुहाने पर है ऐसे में पूरा मानवाधिकार आयोग तीन दिनों के लिए लखनऊ में कैंप करने जा रहा है।
15 से 17 जनवरी के बीच खुद आयोग के चेयरमैन जस्टिस केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में फुल बेंच व डिवीजन बेंच उत्तर प्रदेश से जुड़े 94 मामलों की सुनवाई करेगी।
आयोग ने अब तक जितने आदेश दिए हैं उनमें प्रदेश सरकार ने क्या कार्रवाई की, उसकी भी समीक्षा होगी। दरअसल, मुजफ्फरनगर का दंगा पहले से ही समाजवादी पार्टी की सरकार के लिए गले की हड्डी बन चुका है।
आयोग की एक टीम पिछले दिनों मुजफ्फरनगर के उन कैंपों में गई थी, जहां पर पिछले दिनों ठंड से बच्चों की मौत की खबर आई थी। आयोग इस मामले में भी प्रदेश सरकार से जवाब-तलब करेगा।
ऐसे में सरकार मानवाधिकार आयोग के आने से पहले अपनी चीजों को दुरुस्त करने में जुट गई है। सरकार को यह लग रहा है कि इस समय कोई चूक हुई तो विपक्षियों को बैठे-बैठाए एक मुद्दा मिल जाएगा।
इससे सरकार की किरकिरी हो सकती है इसी को देखते हुए पिछले दिनों खुद मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने विभागों के प्रमुख सचिव व सचिवों को बुलाकर उनके यहां मानवाधिकार आयोग से जुड़े प्रकरणों की समीक्षा की।
इसमें उन्होंने आयोग के उन आदेशों पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए, जो अरसे से विभागों में धूल खा रहे हैं।
इसके बाद गृह, कारागार, महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य विभाग जैसे प्रमुख विभागों ने अपने यहां के मामलों को तत्परता से निपटाने भी शुरू कर दिए हैं।