ये भैंसें वाकई तकदीर वाली हैं। जिस सूबे में सिक्योरिटी मांगने वाले नेताओं की लंबी फेहरिस्त हो, थानों में पुलिस फरियादियों से सीधे मुंह बात न करती हो, वहां भैंसों को वीआईपी ट्रीटमेंट मिलना काबिले तारीफ है।
शायद यही वजह है कि पिछले कुछ दिनों से सियासी हलकों में उपचुनाव से ज्यादा भैंसों को लेकर चर्चा हो रही है।
पर, अचानक सुर्खियों में आईं ये भैंसें किसकी हैं इसका खुलासा आजतक नहीं हो पाया है।
सहारनपुर के एक नेताजी ने पहले कहा कि भैंसें सूबे में नंबर दो हैसियत रखने वाले वजीर की हैं। बाद में पता नहीं क्या हुआ, वही नेताजी पटियाला से लाई गई इन भैंसों को खुद का बताने लगे।
सवाल है कि भैंसें जनाब वजीर साहब की नहीं हैं तो फिर उनके नजदीकी नेताजी ने झूठ क्यों बोला? सपा मुख्यालय पर एक नेता ने टिप्पणी की, भैंसों को लेकर दूसरी बार चर्चा में आए हैं।
इमेज पर असर पड़ रहा है, इसलिए सफाई दिला रहे हैं कि भैंसें वजीर की नहीं हैं। बहरहाल सरकारी महकमों ने जिस तरह भैंसों की आवभगत की, उससे इतना तो तय है कि ‘वीआईपी’ कोई भी हो सकता है, बस नेताजी की नजरे इनायत हो जाए।