देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी के एक नेताजी को इस बार के उपचुनाव में दूसरी बार टिकट मिला था, लेकिन वे मौके की नजाकत को भांप नहीं पाए।
छात्र राजनीति की धमक के सहारे ही वे इस चुनाव की नैया भी पार लगाना चाहते थे। वे समझ नहीं पाए कि छात्र राजनीति व मुख्य राजनीति में बहुत अंतर होता है।
चुनाव प्रचार के दौरान जब नेताजी के समर्थक एक मोहल्ले में वोट मांगने गए तो एक मतदाता ने उन्हें खरी-खरी सुना दी। कहा-नेताजी से कह दो कि वोट मांगने के लिए खुद आना पड़ता है और समाज सेवा भी करनी होती है.।
मतदाता की यह सीख समर्थकों ने जब नेताजी को बताई तो वे तिलमिला गए। उन्होंने फोन पर ही उस मतदाता को भरपूर धमकाया। फिर क्या था मतदाता ने भी अपनी जाति के लोगों की मीटिंग बुलाई और आपबीती सुना दी।
इसके बाद जो हुआ, सबके सामने है। नेताजी को पिछले चुनाव से भी कम वोट मिले..। अब तो समर्थक भी कह रहे हैं कि उन्होंने नेताजी को बहुत समझाया कि चुनाव में हर एक वोट जरूरी होता है..। .लेकिन नेताजी हैं कि सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे।