कहावत है कि डूबते जहाज पर कोई भी नहीं बैठना चाहता। कुछ यही हाल सूबे की ब्यूरोक्रेसी का है। लोकसभा चुनाव के नतीजे क्या आए ब्यूरोक्रेसी भी रंग बदलने लगी।
नौकरशाह 2017 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए अभी से ही समीकरण साधने में जुटे हैं।
कुछ आईएएस तो अपने जानने वालों को फोन करके पता कर रहे हैं कि भाई क्या चल रहा है..., निजाम का मिजाज कैसा है..., क्या होने वाला है..., छोटे-मोटे बदलाव ही होंगे कि ऊपर (पंचम तल) से नीचे तक सभी बदले जाएंगे..., वगैरह-वगैरह।
कुछ तो अभी से इस जुगाड़ में लग गए हैं कि केंद्र में तैनाती पर बात न बन पाए तो एनसीआर ही पहुंच जाएं।
फायदा यह होगा कि केंद्रीय मंत्रियों से नजदीकी बनी रहेगी और साथ में यूपी के बड़े नेताओं के दिल्ली आने-जाने पर भी भेंट-मुलाकात का मौका मिलता रहेगा।
आगे चलकर अगर 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजे लोकसभा की तर्ज पर आए तो कम से कम मलाईदार पोस्टिंग के लिए बहुत हाथ-पांव तो नहीं मारना पड़ेगा।
सही भी है किसी एक दल के साथ बंधे रहने से ज्यादा फायदा इसी में है कि जहां मौका मिले खुद को फिट कर लो।