भाजपा व उसके सहयोगी दलों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 73 सीटों पर जीत हासिल की थी। बसपा का तो खाता भी नहीं खुल सका था। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी मतदाताओं से भाजपा का रंग नहीं उतरा। उसे 325 सीटें मिलीं।
विरोधी दलों का वोट प्रतिशत दोनों ही चुनाव में भाजपा से इतना कम रहा कि उनके लिए अलग-अलग चुनाव लड़कर भाजपा का विजय रथ रोक पाना आसान नहीं है। भाजपा विरोधी मतों का बंटवारा हुआ तो उसकी राह फिर आसान हो जाएगी। भाजपा को चुनौती पेश करने के लिए विपक्ष की एकता ही बड़ा हथियार मानी जा रही है।
एक बसपा नेता के मुताबिक मायावती गठबंधन की राजनीति के साइड इफेक्ट जानती हैं। जल्दबाजी में गठबंधन की घोषणा तो कर दी जाती है लेकिन चुनावों के समय सीटों के बंटवारे पर बात बिगड़ जाती है।
शायद यही वजह है कि मायावती कह चुकी हैं कि वह भाजपा के खिलाफ गठबंधन के विरोध में नहीं है लेकिन इससे पहले लोकसभा चुनाव में सीट बंटवारे पर फैसला होना चाहिए। वह चाहती हैं कि पहले यह तय हो कि 2019 में गठबंधन किया जाए तो कौन कितनी और कौन सी सीट पर लड़ेगा।
उपचुनाव को लेकर हालांकि बसपा ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन वह इससे किनारा कर सकती है। चूंकि अभी गठबंधन के लिए प्रारंभिक बातचीत भी नहीं हुई है इसलिए बसपा किसी दल का समर्थन करने से परहेज करेगी।
विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ चुके सपा और कांग्रेस गोरखपुर व फूलपुर में शायद ही नजदीक आएं। राजनीति के जानकार मानते हैं कि यदि बसपा ने गठबंधन को हरी झंडी नहीं दी तो सपा व कांग्रेस अपने-अपने प्रत्याशी उतारेंगे। ऐसे में उनकी दोस्ती दांव पर लग जाएगी। यूं भी कानपुर देहात की सिकन्दरा सीट पर हुए विधानसभा उपचुनाव में दोनों की राह जुदा थी।
सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव
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विपक्ष के कई नेता सीबीआई जांच में फंसे हैं। इनके नेताओं का कहना है कि विपक्षी दल गठबंधन की तरफ बढ़े तो उन पर जांच एजेंसियों का शिकंजा कस सकता है। इससे बचने के लिए भी गठबंधन की कोशिशें परवान नहीं चढ़ रही हैं। संभव है कि लोकसभा चुनाव नजदीक आने पर विपक्षी एकता कोई आकार ले। पिछले दिनों सपा, बसपा, कांग्रेस, रालोद जैसे दलों ने गठबंधन के संकेत दिए हैं।