उपचुनाव में प्रत्याशी भले ही उपेन्द्र शुक्ल और कौशलेन्द्र पटेल हों लेकिन वास्तव में यह चुनाव निजी तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की प्रतिष्ठा से जुड़ा है।
जीत-हार का नतीजा तो बाद में आएगा। पर, चुनावी गणित में जिस तरह भाजपा भारी दिख रही है उससे कहा जा सकता है कि दोनों नेताओं की कोशिश भाजपा की जीत के अंतर को न सिर्फ बरकरार रखने की होगी बल्कि इसे बढ़ाने की भी होगी। बसपा इस बार मैदान में नहीं है।
आम चुनाव में बसपा को दोनों ही स्थानों पर लगभग डेढ़-डेढ़ लाख वोट मिले थे। देखना यह है कि उसके वोटर किधर जाते हैं। उसके वोटों का रुझान गोरखपुर और फूलपुर की चुनावी लड़ाई को दिलचस्प बना सकता है।
आंकड़ों की चुनौती भाजपा ही नहीं सपा और कांग्रेस के सामने भी है। यदि दोनों ही पार्टियों को आम चुनाव में मिले वोट से अधिक मिलते हैं तो माना जाएगा कि बसपा की गैरहाजिरी में उसके समर्थक मतदाताओं ने भाजपा के बजाय विपक्ष को तरजीह दी है।
तब सपा और कांग्रेस को भाजपा सरकारों पर निशाना साधने का आधार भी मिल जाएगा। पर, यदि ऐसा नहीं होता है तो भाजपा को अगले चुनाव के लिए न सिर्फ मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलेगी बल्कि यह संदेश भी साफ हो जाएगा कि दावों के बावजूद जनता का रुख अभी भाजपा के पक्ष में ही है। मोदी और योगी की नीतियों पर लोगों का भरोसा कायम है।
गोरखपुर
-भाजपा को मिले वोट : 5,39,127
-विपक्ष (सपा, बसपा और कांग्रेस) : 4,48, 475
फूलपुर
भाजपा को मिले वोट : 5,03, 564
विपक्ष (सपा, बसपा और कांग्रेस) : 4,17,093