हृदय रोगों में वॉल्व खराब होने के करीब 15 प्रतिशत मामले आ रहे हैं। इनमें वॉल्व रिप्लेसमेंट को कुछ समय पहले तक अपनाया जा रहा था, लेकिन अब डॉक्टर इस सोच के साथ सर्जरी करने लगे हैं कि वॉल्व को अगर सुधारा जा सकता है तो उसे सुधारा जाए।
दरअसल वॉल्व बदलने की वजह से जो समस्याएं हो रही हैं, उससे चिकित्सा विज्ञान के सोचने का ढंग बदलकर रख दिया है। यह जानकारी बुधवार को एसजीपीजीआई लखनऊ के कार्डियोवैस्कुलर और थोरेसिक सर्जरी (सीवीटीएस) के विभागाध्यक्ष ने दी।
संस्थान में गुरुवार से शुरू होने जा रही चार दिवसीय इंडिया एसोसिएशन ऑफ कार्डियोवैस्कुलर एंड थोरेसिक सर्जरी कॉन्फ्रेंस (एआईसीटीएसकॉन 2016) में कुछ इसी तरह के नए विषयों को सामने रखने के लिए दुनिया भर से हृदय रोग सर्जन शामिल हो रहे हैं।
आयोजन सचिव डॉ. निर्मल गुप्ता ने बताया कि 1100 के करीब डेलीगेट्स एआईसीटीएसकॉन में शामिल होंगे। चार दिनों के दौरान 150 से अधिक शोधपत्र और व्याख्यान देश विदेश के सर्जन व विशेषज्ञ प्रस्तुत किए जाएंगे तो वहीं कई वर्कशॉप भी होंगी।
50 वक्ता करेंगे अपने अनुभव साझा
डॉ. गुप्ता ने बताया कि आईएसीटीएस के इस सालाना आयोजन को पहली दफा लखनऊ में कराया जा रहा है। इसके लिए करीब तीन वर्ष की तैयारी की गई। वहीं ‘हृदय की सर्जरी में इनोवेशन’ विषय पर केंद्रित 50 वक्ता अपने अनुभव साझा करेंगे।
कॉन्फ्रेंस के दौरान दूसरा महत्वपूर्ण विषय हृदय की मिनिमली इवेसिव सर्जरी होगी जिसमें ढाई इंच के कट के साथ हृदय की सर्जरी को किया जा रहा है। डॉ. गुप्ता ने बताया कि इसकी वजह से ओपन हार्ट सर्जरी के खतरे कम हुए हैं।
पीजीआई में इस तरह की सर्जरी पिछले चार वर्षों से की जा रही है। पीजीआई में सालाना 18 हजार की ओपीडी में से करीब 20 प्रतिशत हृदय रोगों के मामले हैं। इनमें से 15 प्रतिशत को सर्जरी की जरूरत पड़ रही है।
यह दर्शाता है कि हृदय सर्जन की जरूरत चिकित्सा सुविधाएं देने के लिए लगातार बढ़ रही है। डॉ. गुप्ता ने कहा कि इस समय पूरे देश में केवल 1500 हृदय सर्जन हैं और इसका नुकसान नागरिकों को बेहतर इलाज में दिक्कतें हो रही हैं।
सर्जरी के बाद दी जाती है एंटी कॉग्यूलेंट दवाएं
करीब 700 हृदय सर्जरी कर चुके डॉ. निर्मल गुप्ता ने बताया कि तीन-चार वर्ष पहले तक हृदय का वॉल्व खराब होने पर उसे बदलने का ट्रेंड था, लेकिन इस सर्जरी के बाद नई समस्याएं आने लगी थी।
सर्जरी के बाद एंटी-कॉग्यूलेंट दवाएं दी जाती हैं ताकि रक्त गाढ़ा न हो जाए, लेकिन इसकी वजह से महिलाओं को माहवारी के दौरान अधिक रक्त बहने की समस्या आने लगी। वे एनीमिया से पीड़ित होने लगीं।
दूसरी ओर युवतियों में गर्भधारण लगभग असंभव हो गया क्योंकि इससे प्रसव के दौरान अधिक खून बहने और बच्चे व मां दोनों की जान को खतरा हो गया।
दूसरी ओर इन मरीजों को अगर अपेंडिक्स जैसा छोटा ऑपरेशन भी करवाना होता तो उनकी जान को खतरा बन जाता है। इन हालात में अब हृदय सर्जन वॉल्व को बदलने के बजाय जहां तक संभव हो रिपेयर करने पर जोर दे रहे हैं।