लखनऊ। निजी प्रतिष्ठानाें के पंजीकरण व नवीनीकरण की प्रक्रिया में अफसरों ने खेल करना शुरू कर दिया है। नए अधिनियम के लागू होने बाद इस बार पांच साल का लाइसेंस जारी होगा। छोटे अस्पतालों से पांच साल की एनओसी नहीं ली जा रही है। अफसरों ने बीच का रास्ता निकालकर उनका पंजीकरण व नवीनीकरण शुरू कर दिया है।
शहर में करीब एक हजार से अधिक निजी अस्पताल-क्लीनिक व लैब का संचालन हो रहा है। इस साल छोटे अस्पताल भी अब क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के दायरे में आ गए हैं। उन्हें भी अब पांच साल का लाइसेंस जारी होगा। इसकी प्रक्रिया विभाग ने शुरू कर दी है। अहम बात यह है छोटे अस्पतालों को फायर की एनओसी, बॉयाेमेडिकल वेस्ट, प्रदूषण का पांच साल का लाइसेंस संबंधित विभागों से लेना था। जिसके बाद अस्पतालों का पंजीकरण-नवीनीकरण होगा।
अफसरों ने बीच का रास्ता निकाल लिया है। निजी प्रतिष्ठानों को लाइसेंस तो पांच साल का जारी हो रहा है, मगर एनओसी साल भर की ले रहे हैं। अफसरों का तर्क है कि फायर, बॉयोमेडिकल व प्रदूषण की एनओसी संबंधित विभाग देखेंगे। स्वास्थ्य विभाग डॉक्टर की डिग्री व स्टॉफ का रिकार्ड लेकर उनका पंजीकरण व नवीनीकरण करेगा। नर्सिंग होम के नोडल डॉ. एपी सिंह के मुताबिक, पंजीकरण व नवीनीकरण अफसरों के जरिए दी गई गाइडलाइन के तहत किए जा रहे हैं। अब संबंधित विभाग एनओसी का मसला देखेंगे।
अब स्टॉफ का दर्ज नहीं होगा रिकार्ड
नए अधिनियम के लागू होने बाद अब पंजीकरण व नवीनीकरण पेपर पर स्टॉफ का नाम दर्ज नहीं होगा। इससे पहले स्टॉफ का नाम दर्ज होता था। पांच साल का लाइसेंस जारी होने के बीच में ही कई स्टॉफ अलग-अलग संस्थानों में चले जाएंगे। नतीजा पंजीकरण-नवीनीकरण पत्र पर उसी स्टॉफ का नाम दर्ज होने पर अड़चन आएगी। ऐसे में अफसरों ने स्टॉफ का नाम पत्र में दर्ज न करने के निर्देश दिए हैं।