लखनऊ। गहराते व्यावसायिक गैस संकट ने न केवल बड़े होटलों, बल्कि अपने दम पर स्वरोजगार कर रहीं महिलाओं की भी कमर तोड़ दी है। महिला स्वयं सहायता समूह, टिफिन सर्विस और लघु उद्योगों से जुड़ी हिलाओं के सामने अब कामकाज बंद करने या फिर से लकड़ी के चूल्हे के पुराने दौर में लौटने की मजबूरी आ खड़ी हुई है।
बेकिंग छोड़ अब चूल्हे पर लौटने की मजबूरी
इंदिरानगर की बेकर रिचा कहती हैं कि हमने सोचा था कि धुएं से आजादी मिल गई है, लेकिन गैस की किल्लत और बढ़ती कीमतों ने मुनाफे को खत्म कर दिया है। अब घर चलाने के लिए वापस मिट्टी के चूल्हे और धुएं के बीच काम करने पर विचार करना पड़ रहा है।
लघु उद्योगों पर ताला लगने का डर
निशातगंज के श्री जगदंबा स्वयं सहायता समूह की मणी टंडन बताती हैं कि उनके यहां 12 महिलाएं पापड़ और चिप्स बनाकर अपना घर चलाती हैं। एक सिलेंडर हफ्ता भर भी नहीं चलता। अगर लागत बढ़ी तो हमें दाम बढ़ाने पड़ेंगे, मगर इससे मांग घटने का डर है। ऐसे में उद्योग बंद करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।
बुझने लगी टिफिन सर्विस की आंच
गोमतीनगर के विराम खंड-5 में टिफिन सर्विस चलाने वाली मीनू श्रीवास्तव और उनके पति राकेश बताते हैं कि गैस की बुकिंग न होने से काम ठप होने के कगार पर है। आमदनी से ज्यादा खर्चा होने के कारण अब टिफिन सर्विस जारी रखना नामुमकिन लग रहा है।
सिलिंडर के लिए परेशान लोग।
सिलिंडर के लिए परेशान लोग।
सिलिंडर के लिए परेशान लोग।