लखनऊ। यदि जन्म के कुछ समय बाद बच्चे के पैर टेढ़े दिखें तो उसे केजीएमयू के पीडियाट्रिक आर्थोपेडिक विभाग में दिखाएं। यहां मुफ्त में इलाज मिल रहा है। जितनी जल्दी इलाज शुरू होगा, उतने की कम समय में फायदा मिलता है। केजीएमयू में डेढ़ साल में तीन हजार बच्चों के पैर ठीक किए जा चुके हैं। बुधवार को 3000 बच्चों के इलाज का आंकड़ा पूरा होने पर विभाग में जश्न मनाया गया। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का पैर ठीक करने वाला केजीएमयू प्रदेश का पहला व देश का दूसरा संस्थान बन गया है। यहां हर सप्ताह करीब 38 बच्चों का इलाज हो रहा है।
केजीएमयू पीडियाट्रिक आर्थोपेडिक्स विभागाध्यक्ष प्रो. अजय सिंह ने बताया कि हड्डियों व जोड़ों के जन्मजात विकार की वजह से यह समस्या होती है। इसे क्लब फुट कहते हैं। केजीएमयू में इसका मुफ्त में इलाज होता है। पैर को खींचकर और मोड़कर बाहर और ऊपर की तरफ कर दिया जाता है। इसके बाद पैर की अंगुलियों से लेकर जांघ के ऊपरी हिस्से तक प्लास्टर चढ़ा देते हैं। दो हफ्ते बाद फिर देखते हैं और उसी हिसाब से दोबारा प्लास्टर लगाते हैं। इस तरह करीब छह से आठ बार प्लास्टर लगाने से पैर में सुधार हो जाता है। इसके बाद खास तरह के जूते तैयार कराए जाते हैं। करीब 10 प्रतिशत बच्चों में सर्जरी की जरूरत पड़ती है। बच्चों के इलाज के लिए केजीएमयू को क्लब फीट इंटरनेशनल इंडिया और आरबीएसके संस्था से सहयोग मिल रहा है। बच्चों का इलाज करने वाली टीम में प्रो. अजय सिंह के साथ डॉ. नजमुल, डॉ. विकास वर्मा, डॉ. सुरेश चंद्रा, डॉ. सईद फैजल, डॉ. प्रभाकर पांडेय, डॉ. अभिनव भरत व डॉ. हाशिम शामिल हैं। यह जन्मजात समस्या है। आनुवंशिक भी होती है। यदि किसी परिवार में एक बच्चे को समस्या है तो दूसरे बच्चों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। इसके अलावा गर्भावस्था में चूल्हा फूंकते वक्त धुआं जाने अथवा स्मोकिंग की वजह से लेड की मात्रा अधिक होने, आयरन व विटामिन बी 12 की मात्रा कम होने से भी यह बीमारी होती है। वहीं पैर की मांसपेशियों में खून की कमी, कोई संक्रमण, पोलिया या रीढ़ की जन्मजात बीमारी भी क्लब फुट का कारण बनती है। बच्चे के जन्म के बाद उसके पैरों को ध्यान से देखें। क्लब फूट में पैर नीचे की तरफ अंदर की ओर मुड़ा दिखता है। एड़ी जमीन से उठी होती है। दोनों पैरों में छोटा या बड़ा का अंतर दिखता है।