यूपी में लगाए गए अधिकतर पौधों के तीन साल के भीतर ही नष्ट होने की अपनी ही रिपोर्ट पर वन विभाग ने कोई ध्यान नहीं दिया गया। करीब पांच साल पहले विभाग की अनुश्रवण एवं मूल्यांकन इकाई ने इसका खुलासा किया था, पर मुख्यालय और शासन के अफसरों ने इसे पूरी तरह से दबा दिया। खामियां न सुधारे जाने का ही परिणाम है कि हाल ही में आई फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में प्रदेश के ट्री कवर (वृक्षावरण) में 100 वर्ग किलोमीटर की कमी बताई गई है।
अनुश्रवण एवं मूल्यांकन इकाई ने 2004-05 और 2009-10 के बीच रोपे गए पौधों का तीन साल बाद सैंपल सर्वे कराया गया तो बड़े हिस्से में सफलता का प्रतिशत मानक से काफी कम मिला। विभागीय अधिकारियों की मानें तो सैंपल सर्वे में उन स्थानों को शामिल किया गया था, जहां संबंधित अफसरों ने अच्छी देखभाल का दावा किया था। अगर ऐसा न किया जाता तो परिणाम और भी खराब आते।
मूल्यांकन इकाई की यह रिपोर्ट प्रकाशित की गई, पर इसकी इतनी कम प्रतियां छापीं गईं कि यह कुछ ही अधिकारियों के बीच बंटकर रह गई। अगर इस रिपोर्ट में बताई गई खामियों पर ध्यान दिया होता और मानक के अनुरूप पेड़ बचे होते तो निश्चित ही ट्री कवर बड़ा होता।
हकीकत बताती विभाग की एक गोपनीय रिपोर्ट
2004-05 : उस वर्ष रोपे गए पौधों का तीन साल बाद यानी 2007-08 में सर्वे कराया गया। कुल 5806.09 हेक्टेयर का सैंपल सर्वे हुआ, जिसमें से 207 हेक्टेयर में बमुश्किल 20 प्रतिशत पौधे ही बचे। 106.72 हेक्टेयर में 33 प्रतिशत सफलता मिली, जबकि महज 2849.71 हेक्टेयर में ही निर्धारित मानक के अनुसार पौधे जीवित मिले। यानी 51 फीसदी जमीन पर मानक से कम पौधे जीवित बचे।
2005-06 : उस वर्ष रोपे गए पौधों का वर्ष 2008-09 में सर्वे कराया गया। कुल 9238.31 हेक्टेयर में स्थिति देखी गई। 123.60 हेक्टेयर में सफलता 0-20 प्रतिशत ही रही। 74 हेक्टेयर में 20-33 प्रतिशत पौधे ही जीवित मिले। 3207.40 हेक्टेयर में 33 प्रतिशत से अधिक, लेकिन 59 प्रतिशत से कम पौधे जीवित बचे। 5832.91 हेक्टेयर में ही शासन के निर्धारित मानक के अनुरूप पौधे जीवित बचे।
2006-07 : रोपे गए पौधों का 2009-10 में सर्वे कराया गया। कुल 20518.74 हेक्टेयर को सैंपल सर्वे में शामिल किया गया। 107 हेक्टेयर में सफलता 0-20 फीसदी, 37 हेक्टेयर में 20-33 फीसदी, 7049.81 हेक्टेयर में 33-58 फीसदी रही। महज 13324.93 हेक्टेयर में ही सफलता मानक के अनुरूप 59-75 फीसदी मिली।
2007-08 : तीन साल बाद यानी 2010-11 में 17485.01 हेक्टेयर में सैंपल सर्वे किया गया। 294.00 हेक्टेयर में 0-20 प्रतिशत, 117.74 हेक्टेयर में 20-33 प्रतिशत, 6998.25 प्रतिशत में 33-58 प्रतिशत और 10075.02 हेक्टेयर में 59-75 प्रतिशत पौधे जीवित बचे। मतलब, कुल पौधरोपण के 43 फीसदी हिस्से में परिणाम आशा के अनुरूप नहीं रहे।
2008-09 : उस वर्ष लगाए गए पौधों का 2011-12 में सर्वे कराया गया। 17035.22 हेक्टेयर जमीन को सैंपल सर्वे में शामिल किया गया। 323.33 हेक्टेयर में 0-20 प्रतिशत, 47 हेक्टेयर में 20-33 प्रतिशत, 5148.18 हेक्टेयर में 33-58 प्रतिशत और 11516.71 हेक्टेयर में 59-75 प्रतिशत पौधे जीवित बचे। 2011-12 में बहुत ही कम 17.80 प्रतिशत हिस्से में सैंपल सर्वे कराया गया। बताते हैं कि सैंपल सर्वे में उन जगहों को शामिल किया गया, जहां पौधरोपण सफलता के लिहाज से दूसरी जगहों के मुकाबले सफल रहा था।
2009-10 : तीन साल बाद यानी 2012-13 में 19823.02 हेक्टेयर में सैंपल सर्वे हुआ। 683.42 हेक्टेयर में 0-20 प्रतिशत, 61 हेक्टेयर में 20-33 प्रतिशत, 1860.98 में 33-58 प्रतिशत सफलता मिली। 17217.62 हेक्टेयर में ही 59-75 प्रतिशत पौधे जीवित बचे। (स्रोत : वन विभाग)
कहता है मानक, कब-कितने पौधे बचने चाहिए (प्रतिशत में)
क्षेत्र तीसरे वर्ष में पांचवे वर्ष में
विकसित 70 45
ऊसर (पीएच-9 तक) 70 45
ऊसर (पीएच 9-10.5 तक) 50 35
खादर (जल प्लावित) 70 45
अच्छी मिट्टी 90 65
खोला 85 65
ग्राम सभा (ऊसर नहीं) 75 55
ग्राम सभा (पीएच 9 तक) 65 45
ग्राम सभा (पीएच 9-10.5) 50 35
पटरी (सड़क किनारे) 95 80
नहर किनारे 95 80
रेल पटरी के किनारे 85 65
तराई (यांत्रिक पौधरोपण) 90 75
तराई (श्रमिक पौधरोपण) 80 65