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12 रुपए की एंटीबैटिक यहां मिल रही है 48 रुपए में

Mon, 05 Oct 2015 04:12 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/लखनऊ
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लखनऊ के प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल में एक दवा जो कि 12 रुपए की है वह यहां 48 रुपए में बेची जा रही है।
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एमिकासिन नाम की सामान्य सी एंटीबायोटिक जो रेट कांट्रैक्ट में 12 रुपये की मिलती है, लोहिया संस्थान में उसकी जगह एमिफेक्ट, एमिरिव 48-65 रुपये में खरीदी जा रही है।

इसी तरह मैटम नाम की एंटीबायोटिक जो रेट कांट्रैक्ट में 63 रुपये ही है उसकी जगह ऑरजिड, सेंजट 150 से 160 रुपये में खरीदा जा रहा है। ये दो ही नहीं दर्जनों ऐसी दवाएं हैं जो रेट कांट्रैक्ट में हैं लेकिन उसी साल्ट या मॉलिक्यूल की दवाएं दूसरी कंपनियों की महंगे दामों में खरीदी जा रही हैं।
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सात साल से अधिक अधिक समय होने के बावजूद संस्थान की दवाओं की अपनी रेट कांट्रैक्ट (आरसी) की सूची नहीं बनी है। प्रशासनिक अधिकारियों और डॉक्टरों की मिलीभगत से चल रहे कमीशन के खेल से मरीजों को कई गुना अधिक दाम पर दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

लोहिया संस्थान में कमीशनखोर गरीब मरीजों को महंगी दवाएं लेने पर मजबूर कर रहे हैं। एसजीपीजीआई के रेट कांट्रैक्ट पर दवाएं खरीदने का दावा कर रहे अधिकारी इसमें भी गड़बड़ी कर रहे हैं।

जो दवाएं आरसी लिस्ट में शामिल हैं उनकी आपूर्ति कंपनी नहीं कर रही हैं। इसलिए लोकल पर्चेज से महंगी दवाएं खरीद कर कमीशन से जेब भरी जा रही है। लोहिया इंस्टीट्यूट में हर दिन फार्मेसी में औसतन साढ़े चार से पांच लाख रुपये की बिलिंग होती है।

इसमें से 60 फीसदी से अधिक दवाएं लोकल पर्चेज से आती हैं। मरीजों को आरसी लिस्ट में शामिल दवाएं 40 फीसदी सस्ती मिलती हैं वहीं लोकल पर्चेज से खरीदी जाने वाली दवाओं पर सिर्फ 10 से 15 फीसदी की छूट मिलती है।
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संस्थान जल्द बनायेगा आरसी

लोहिया संस्थान में आरसी नहीं है इसलिए पीजीआई की आरसी पर दवाओं की आपूर्ति होती है। जो दवा फार्मेसी में नहीं है वो लोकल पर्चेज से खरीदकर मरीजों को दी जा रही है। जल्द ही संस्थान अपनी आरसी बनाएगा, जिसके बाद स्थिति सामान्य हो जाएगी। डॉ. दीपक मालवीय, निदेशक, लोहिया संस्थान
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