केजीएमयू के फायर फाइटिंग सिस्टम को इलाज की दरकार है। परिसर में लगे फायर फाइटिंग सिस्टम पूरी तरह खराब हो चुके हैं। जगह-जगह लगे बक्से में न तो नॉब है और न ही पाइप।
ऐसे में आग लगने पर कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है और मरीजों की जान पर बन सकती है। बीते दिनों में शॉर्ट सर्किट से आग लगने की कुछ घटनाएं हुई भी हैं। बावजूद प्रशासन उदासीन बना हुआ है।
मालूम हो कि बृहस्पतिवार को गांधी वार्ड के आईसीयू में लगी आग से भले ही मरीजों को नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन आग लगने के बाद वार्ड और केजीएमयू परिसर में मरीजों और तीमारदारों की दहशत ने फायर फाइटिंग की बदहाली को बेपर्दा कर दिया है।
केजीएमयू, न्यू ओपीडी ब्लॉक, पीडियाट्रिक सर्जरी, शताब्दी अस्पताल, ट्रॉमा सेंटर और लिंब सेंटर में लगे फायर फाइटिंग सिस्टम जवाब दे चुके हैं। न्यू ओपीडी ब्लॉक को बनाने में करोड़ों रुपये बहाए गए।
ओपीडी के भीतर फायर फाइटिंग सिस्टम की स्थिति तो बेहतर है, लेकिन बाहर लगे जिस प्वॉइंट से इमरजेंसी में पानी की सप्लाई होती है उसमें नॉब ही नहीं है।
इतना जरूर है कि सिस्टम में नॉब लगाने के लिए जगह छोड़ दी गई है। ओपीडी ब्लॉक को शुरू हुए महीने हो गए, लेकिन आज तक नॉब नहीं लगा है। ऐसा ही कुछ हाल पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग का है।
फायर फाइटिंग सिस्टम को पानी सप्लाई के लिए लगे बॉक्स में ताला लगा है, लेकिन उसके शीशे टूट चुके हैं। इससे लोगों ने अब उसमें कूड़ा डालना शुरू कर दिया है।
यही हाल ट्रॉमा सेंटर का है। 280 बेड के ट्रॉमा सेंटर के बाहर तीन सिस्टम लगाए गए हैं लेकिन सब जंग खाकर जर्जर हो गए हैं। सूत्र बताते हैं कि कैंपस में जो सिस्टम लगा है उसकी जांच भी नहीं की गई है कि वो चलता भी है या नहीं।