उर्दू राजनीति पर हुए तीसरे सत्र में मुर्तुज अली, मोहम्मद अली, दीपक रंजन ने विचार रखते हुए उर्दू की प्रासंगिकता बताई। इसी क्रम में नवाब जाफर मीर अब्दुल्लाह, अतहर नबी और मोहसिन खान ने उर्दू के गद्य-पद्य रचनाकारों व उनकी रचनाओं के हवाले से उर्दू को एक समृद्ध भाषा बताया।
कार्यक्रम के दौरान कर्नल जाहिद की पुस्तक का विमोचन भी किया गया। इस अवसर पर अर्जुन और जमाल ने संगीत महफिल सजाई। महाभारत में अर्जुन बने फिरोज खान ने मो. रफी के ‘मैं कहीं कवि न बन जाऊ...’, ‘आजा-आजा मै हूं प्यार तेरा...’, ‘जमाल ने पग घुंघरू बांध मीरा नाची थी...’, ‘मेरे महबूब कयामत होगी...’ जबकि ईशा खान ने ‘सौ साल पहले...’, ‘रात के हमसफर... सहित कई गीत सुनाए। समारोह में आए मेहमानों को संस्था के सचिव वामिक खान व अध्यक्ष संजय सिंह ने स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में उर्दू पत्रकारिता पर चर्चा हुई, जिसमें हिसाम सिद्दीकी ने कहा कि उर्दू के भविष्य को लेकर जहां लोग फिक्रमंद हैं, वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो उर्दू का भविष्य रौशन मानते हैं। फिल्में हों या टीवी धारावाहिक सब जगह उर्दू की जरूरत है।
उर्दू मीडिया के उजले पक्ष को देखा जाए, तो यह पीत पत्रकारिता से काफी हद तक दूर है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और कुछ अन्य मीडिया समूह उर्दू चैनल्स लाए हैं। उर्दू अखबारों की वेबसाइटें और ई-संस्करण इत्यादि भी खासे हैं।
फैजान मुसन्ना ने कहा कि अनेक अखबारों ने उर्दू के लिए हिंदी की देवनागरी लिपि भी अपनाई है। इन सबसे तो यही संकेत मिलता है कि उर्दू पत्रकारिता के लिए माहौल पहले से सुधरा है। उर्दू सहाफत के ऐतिहासिक सामाजिक पक्ष को समेटे इस सत्र में एवी सिंह, अफीफ सिराज इत्यादि शामिल हुए। कार्यक्रम का संयोजन एसएन लाल ने किया।