एक साथ तीन तलाक पर पाबंदी के लिए लोकसभा से पारित हुए बिल को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने राजनीतिक बिल करार दिया। बोर्ड का मानना है कि मौजूदा बिल मुस्लिम महिलाओं को राहत देने के बजाय नुकसान पहुंचाने वाला है। दूसरी ओर, तीन तलाक पर रोक के लिए कानून की मांग कर रहीं मुस्लिम महिलाओं ने इसे जरूरी बताने के साथ ही बिल के मौजूदा प्रावधानों पर एतराज भी जताया है। कहा, मौजूदा बिल में कई ऐसे बिंदु हैं, जिन्हें हटाए बिना महिलाओं को फायदा होने वाला नहीं है।
मौलाना खालिद राशिद फिरंगी महली
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तीन तलाक का मौजूदा बिल महिलाओं के खिलाफ
मुस्लिम संगठनों व तीन तलाक पर रोक की मांग कर रही महिलाओं ने मौजूदा बिल पर एतराज जताया था। विपक्षी पार्टियों व मुस्लिम संगठनों ने इस बिल को सलेक्ट कमेटी में भेजने और वहां से संशोधन आने के बाद कानून बनाने की मांग की थी। पर, केंद्र सरकार ने उनकी मांगों को नजरअंदाज कर दिया, यह लोकतंत्र के लिए सही नहीं है। मौजूदा बिल से महिलाओं को नुकसान होगा। बिल में जिन बिंदुओं पर एतराज जताया गया था, उसे हटाया जाना चाहिए।
-मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली, सदस्य, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
जफरयाब जिलानी
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मुस्लिम महिलाओं के विरोध को किया नजरअंदाज
लोकसभा में तीन तलाक बिल पास होना ही था, क्योंकि वहां सरकार के प्रतिनिधियों की संख्या अधिक है। जबकि तमाम विपक्षी पार्टियों ने इसका विरोध किया था। उम्मीद है राज्यसभा में बिल का विरोध होगा। केंद्र की भाजपा सरकार अपने तय एजेंडे पर काम कर रही है। सरकार ने इस कानून के विरोध में देश के बड़े शहरों में सड़कों पर उतरीं करोड़ों महिलाओं की भावनाओं को नजरअंदाज किया है। सरकार का यह फैसला पूरी तरह से राजनीतिक फायदा लेने के लिए किया गया है।
-जफरयाब जिलानी, सचिव, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
नाईश हसन
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तीन तलाक कानून बने, पर सजा कम करे सरकार
तीन तलाक के खिलाफ कानून बनना जरूरी है, लेकिन मौजूदा बिल की खामियों को दूर करना भी जरूरी है। बिल में तीन तलाक को अपराध बनाकर गैर जमानती कर दिया गया। कानून में तीन साल की सजा ज्यादा है, इसे कम किया जाना चाहिए था। हमारी मांग बिल में सुधार की थी, लेकिन उसे नजरअंदाज किया गया है। सरकार को चाहिए कि इस मामले को अदालत में न ले जाकर थाना स्तर पर ही हल का प्रावधान करे, जिससे पति और पत्नी के बीच सुलह व समझौते की गुंजाइश बनी रहे।
-नाईश हसन, महासचिव, मुस्लिम वीमेन लीग
शाइस्ता अंबर
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तीन तलाक पर कानून बने पर संशोधन के साथ
तीन तलाक पर कानून जरूरी है। साथ ही मौजूदा बिल में कुछ संशोधन भी जरूरी है। सरकार से हमने मांग की थी कि वे कानून बनाने से पहले मुस्लिम व महिला संगठनों से राय लेकर ऐसा कानून बनाए, जो सबको स्वीकार्य हो। मगर ऐसा नहीं हुआ। मौजूदा बिल से पति व पत्नी के बीच सुलह की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। तलाक सामाजिक बुराई है, लेकिन इसे अपराध बनाए जाने पर लोग शादी करने से ही डरने लगेंगे। कानून ऐसा होना चाहिये कि शौहर एक साथ तीन तलाक देने से डरे और सुलह की गुंजाइश बनी रहे।
-शाइस्ता अंबर, अध्यक्ष, ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड
बेगम शहनाज
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कानून बनने से तीन तलाक के मामलों में आएगी कमी
एक साथ तीन तलाक को अपराध बनाने का स्वागत है। इससे तलाक के मामलों में कमी आएगी। हमारी लड़ाई तलाकशुदा महिलाओं की आर्थिक मदद को लेकर भी है। महिला व उसके बच्चों के गुजारे की व्यवस्था प्राथमिकता पर होनी चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कानून मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से मजबूती प्रदान करने का भी काम करे। साथ ही शौहर व बीवी में सुलह की गुंजाइश भी बनी रहे।
-बेगम शहनाज सिदरत, अध्यक्ष, बज्म-ए-ख्वातीन
रुकइया परवीन
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तलाक पीड़ितों व बच्चों की आर्थिक मदद का हो प्रावधान
फैमिली एक्ट की धारा 125 के तहत महिलाओं को गुजारा भत्ता हासिल करने का अधिकार है, लेकिन इसे हासिल करने में महिलाओं को 20 साल तक लग जाते हैं। इस दौरान पति दूसरी शादी कर अपना घर बसा लेता और महिला गुजारे के लिए कोर्ट के चक्कर लगाती रहती हैं। प्रधानमंत्री को चाहिए कि एक साथ तीन तलाक पर रोक संबंधी मौजूदा बिल में तलाक पीड़ित महिला को पेंशन व उनके बच्चों की निशुल्क शिक्षा मुहैया कराने का प्रावधान भी करें। वहीं, मामला कोर्ट तक जाने पर इसे तीन साल में निपटाने का भी प्रावधान हो।
-रुकइया परवीन, तीन तलाक पीड़िता