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Lucknow News: 15 वर्ष में ढाई गुना बढ़े फैटी लिवर के मरीज

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प्रतीकात्मक।
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लखनऊ। डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के गैस्ट्रोइंटेरोलॉजिस्ट डॉ. पीयूष उपाध्याय के अनुसार 15 वर्ष में फैटी लिवर के मरीज करीब ढाई गुना बढ़ चुके हैं। इस समय 53 फीसदी आबादी इस बीमारी से प्रभावित है।
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डॉ. उपाध्याय के अनुसार, अपने वजन में सिर्फ दस फीसदी कमी करके इस गंभीर समस्या पर प्रभावी ढंग से काबू पाया जा सकता है। पंद्रह साल पहले महज बीस फीसदी आबादी में फैटी लिवर की समस्या थी। यह बीमारी पेट की समस्याओं, लिवर खराब होने, लिवर सिरोसिस और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है। फैटी लिवर दो प्रकार का होता है: शराब से संबंधित और नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लिवर। नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लिवर को वजन कम करके, खान-पान नियंत्रित करके और नियमित व्यायाम से दूर किया जा सकता है।

वजन कम करना क्यों है जरूरी
डॉ. पीयूष उपाध्याय ने बताया कि फैटी लिवर के पचासी से नब्बे फीसदी मामलों में मरीज का वजन अधिक होता है। 83 फीसदी लोगों की कमर का आकार मानक से ज्यादा पाया गया है। उन्होंने बताया कि तैंतालीस फीसदी लोगों में मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसे डायबिटीज, हाइपरटेंशन और कोलेस्ट्रॉल की अधिकता देखी गई है। वजन कम करने से इन समस्याओं का समाधान हो सकता है और जरूरत पड़ने पर ही दवाओं की आवश्यकता होती है।
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खानपान और जीवन शैली का प्रभाव
फास्टफूड, अधिक मीठा, चिकना और तला-भुना खाना फैटी लिवर का प्रमुख कारण है। खानपान और जीवन शैली की गलत आदतों के कारण यह समस्या तेजी से बढ़ रही है, प्रॉस्पेक्टिव अर्बन रूरल इपिडिमियोलॉजी कोहॉर्ट स्टडी के अनुसार, उत्तर भारत में 53.7 फीसदी शहरी और 30.2 फीसदी ग्रामीण आबादी फैटी लिवर से पीड़ित है।
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