जो विरोध करते हैं वे करें, लेकिन गुलाम अली कहते हैं, 'मैं तो मोहब्बत का पैगाम बांटता हूं। महाराष्ट्र में दो कार्यक्रमों के रद्द होने के बाद अमर उजाला एमएसएमई कॉन्क्लेव 2015 में शनिवार को गजलों का गुलदस्ता लेकर पहुंचे मशहूर पाकिस्तानी गजल गायक गुलाम अली ने कहा कि संगीत तो प्रेम का ही पेशा है। हम तो सबको सुकून, आनंद देना चाहते हैं।
गुलाम अली का संगीत पिछले कई दशकों से सरहदों को लांघकर भारत के लोगों को लुभाता रहा है। उनके जितने चाहने वाले पाकिस्तान में हैं, उससे कई गुना अधिक भारत में हैं और इनमें कई पीढिय़ां शामिल हैं। 'हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह' गाने वाले गुलाम अली एक ऐसे मुसाफिर हैं जो हर साल भारत के कितने ही शहरों में घूम-घूमकर अपने प्रशंसकों से मुखातिब होते रहे हैं।
वास्तव में वे मुसाफिर नहीं, सांस्कृतिक राजदूत हैं। गुलाम अली मानते हैं कि उन्हें भारत से बड़ी मोहब्बत मिलती है। कहते हैं, 'चाहने वालों के लिए ही हम जिंदा हैं। ढेर सारे लोग हैं जो हमारे काम से, हमारे संगीत से प्रेम करते हैं'।
गुलाम अली हाल के विवादों से थोड़े खिन्न हैं और पाकिस्तान लौटने से पहले मीडिया से बचना चाहते हैं। कहते हैं, 'मेरा काम तो गाना है, मुझसे बोलने के लिए मत कहिए।
'अमर उजाला' से खास बातचीत में जब उनका ध्यान इस ओर आकृष्ट किया जाता है कि संगीत तो हमेशा से सौहार्द बनाए रखने का काम करता रहा है, आपके गुरु उस्ताद बड़े गुलाम अली खान (जिनके प्रशंसक होने के कारण ही गजल गायक गुलाम अली के पिता ने बेटे का नाम गुलाम रखा था)
गुलाम अली कहते हैं 'हम तो मोहब्बत बांटने वाले लोग हैं और मोहब्बतें जहां भी हों बहुत काम करती हैं। मैं किसी को खराब या किसी को सही नहीं कहना चाहता। बस यही दुआ मांगता हूं कि अल्लाह सबको अच्छे तरीके से रखे। फिर दोहराते हैं 'सबको, राजनीति करने वालों को भी।
वे बातचीत खत्म करना चाहते हैं लेकिन जब जिक्र उनके खास अंदाज का आ जाता है तो खुश होकर बोल उठते हैं, 'सही है कि मेरा गाने का अंदाज शास्त्रीय संगीत पर आधारित है। बचपन से शास्त्रीय संगीत ही सीखा तो सोचा कि इसमें शायरी की, लफ्जों की चाशनी देकर लोगों को लफ्जों के जरिये शास्त्रीय संगीत सुनाया जाए।