लखनऊ। मुंशी प्रेमचंद की 145वीं जयंती की पूर्व संध्या पर बुधवार को कई आयोजन हुए। किसी ने उनके लेखन में दलित विमर्श की चर्चा की तो किसी ने स्त्री विमर्श पर उनकी लेखनी के पक्ष को प्रमुखता दी। ...लेकिन एक बात समान थी कि सभी जगह वक्ताओं ने एकमत से कहा कि प्रेमचंद का लेखन वर्तमान परिदृश्य में भी प्रासंगिक है।
प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से प्रेमचंद : चिंतन के विविध आयाम विषय पर परिचर्चा के पहले सत्र में इरा श्रीवास्तव ने प्रेमचंद की कहानी तेंतर का पाठ किया। दूसरे सत्र में आलोचक वीरेंद्र यादव ने प्रेमचंद के लेखन के आयामों पर बात की। दलित विमर्श के लेखक जयप्रकाश कर्दम, अलीगढ़ मुस्लिम विवि के पूर्व विभागाध्यक्ष सगीर अफराहीम और वाराणसी की वंदना चौबे ने भी विचार व्यक्त किए।
हजरतगंज स्थित सीबी सिंह स्मृति सभागार में पीपुल्स यूनिटी फोरम की ओर से परिचर्चा का आयोजन किया गया। मौके पर ओपी सिन्हा, वीरेंद्र त्रिपाठी, केके शुक्ला, राजीव गुप्ता और उदयनाथ सिंह आदि मौजूद रहे।
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में गोस्वामी तुलसीदास, प्रेमचंद, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी और चंद्रधर शर्मा गुलेरी स्मृति समारोह का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता डॉ. हरिशंकर मिश्र ने कहा कि तुलसीदास का साहित्य लोक तत्व से परिपूर्ण है। साहित्यकार नरेंद्र भूषण ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में सामाजिक कुरीतियों का व्यापक विरोध मिलता है। संचालन संस्थान की प्रधान संपादक डॉ. अमिता दुबे ने किया।
सांस्कृतिक व सामाजिक संस्था अभिव्यक्ति कल्चरल एंड वेलफेयर सोसाइटी की गोष्ठी में मुख्य वक्ता ललित सिंह पोखरिया ने मुंशी प्रेमचंद को श्रद्धांजलि दी। कहा कि उनकी रचनाएं, कहानियां और उनमें उठाए गए मुद्दे आज भी प्रासंगिक हैं। सेवानिवृत्त आईएएस व समाजसेवी नागेश्वर नाथ उपाध्याय व संस्था के अध्यक्ष प्रदीप श्रीवास्तव, वरिष्ठ नाट्य लेखक, निर्देशक केके अग्रवाल ने भी अपनी बात रखी।
प्रेमचंद ने समाज को दी दिशा
संवाद न्यूज एजेंसी
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लखनऊ। सेवाज्ञ संस्थानम् लखनऊ इकाई एवं नेशनल पीजी कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में व्याख्यान हुआ। मुख्य वक्ता लविवि के हिंदी विभाग की प्रो. हेमांशु सेन ने कहा कि प्रेमचंद ने जिस गंभीरता और सूक्ष्मता से अपने समय के समाज को कथाओं में प्रस्तुत किया, वही संवेदना और सामाजिक आलोचनात्मकता आज के दौर में भी देखी जा सकती है। नेशनल के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. राम कृष्ण ने प्रेमचंद को भारतीय चेतना और सामाजिक समरसता का आदर्श बताया।