लखनऊ। हीमोफीलिया के मरीजों को इलाज के लिए रक्तस्राव होने का इंतजार नहीं करना चाहिए। चिकित्सा का लक्ष्य रक्तस्राव होने के बाद उसे रोकना नहीं, बल्कि उसे होने से बचाना होना चाहिए। रविवार को लखनऊ के एक निजी होटल में हुए यूपी-हीमोफीलिया कॉन्क्लेव 2026 में विशेषज्ञों ने इसी इलाज यानी प्रोफिलैक्सिस को प्रदेश में बढ़ाने पर जोर दिया। उनका कहना था कि समय पर नियमित इलाज से जोड़ों को होने वाले नुकसान और विकलांगता का खतरा कम किया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश हेमेटोलॉजी ग्रुप के तत्वावधान में केजीएमयू के सहयोग से हुए कॉन्क्लेव में चिकित्सक, शोधकर्ता, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और मरीजों के प्रतिनिधि शामिल हुए। प्रो. एके त्रिपाठी ने कहा कि हीमोफीलिया के मरीजों में केवल ब्लीडिंग होने के बाद दवा देने के बजाय पहले से उसकी रोकथाम जरूरी है। नियमित इलाज से कई गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है।
यूपी में करीब 7,700 मरीज पंजीकृत
विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदेश में हीमोफीलिया के करीब 7,700 मरीज पंजीकृत हैं। इनमें लगभग 5,500 हीमोफीलिया-ए से पीड़ित हैं। डॉ. एसपी वर्मा ने कहा कि बार-बार रक्तस्राव से जोड़ों और मांसपेशियों को स्थायी नुकसान हो सकता है। प्रोफिलैक्सिस से मरीजों को स्वस्थ और अधिक स्वतंत्र जीवन जीने में मदद मिल सकती है।
फैक्टर-VIII की उपलब्धता बड़ी चुनौती
मरीजों के प्रतिनिधियों ने सरकारी अस्पतालों में फैक्टर-VIII की अनियमित उपलब्धता और लागत का मुद्दा उठाया। बताया गया कि पिछले वर्ष प्रदेश में हीमोफीलिया के लिए 80 करोड़ रुपये का बजट था। विशेषज्ञों ने प्राथमिक से तृतीयक स्तर तक एक समान इलाज व्यवस्था बनाने पर जोर दिया। इसमें समय पर जांच, नियमित निगरानी, फिजियोथेरेपी और जरूरत पड़ने पर मरीजों को विशेषज्ञ केंद्र तक पहुंचाने की व्यवस्था शामिल होगी।
कॉन्क्लेव में पहुंचे चिकित्सक।