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Lucknow News: खून में बढ़ा हुआ लैक्टेट थकान नहीं, सेहत की है पहचान

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- लविवि की डॉ. नेहा साहू के शोध को अंतरर्राष्ट्रीय जर्नल ने दी मान्यता
माई सिटी रिपोर्टर
लखनऊ। खून में बढ़े हुए लैक्टेट की मात्रा को अभी तक मांसपेशियों के थकान का दोषी माना जाता रहा है।  लेकिन लखनऊ विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नेहा साहू और उनकी टीम की शोध में खुलासा हुआ है कि लैक्टेट की संतुलित मात्रा शरीर को ऊर्जा देने, मस्तिष्क की रक्षा करने और रोगों से लड़ने में भी अहम भूमिका निभाता है।
इस शोध में डाॅ नेहा के अलावा अमेरिका, सऊदी अरब, मलेशिया के वैज्ञानिकों ने मिलकर काम किया। अंतरर्राष्ट्रीय जर्नल फ्रंटियर इन फिजियोलाॅजी ने इस शोध को प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
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डॉ. नेहा साहू का कहना है कि लैक्टेट अब सिर्फ थकान का संकेत नहीं, बल्कि शरीर का मैसेंजर है जो मेटाबॉलिज्म, मस्तिष्क और आंतों के बैक्टीरिया को एक साथ जोड़ता है।
-  'डबल एजेंट'  की तरह काम करता है लैक्टेट
यानी लैक्टेट एक 'डबल एजेंट' की तरह काम करता है। किन्हीं कारणों से जब यह ज्यादा बनता है तो कैंसर और स्ट्रोक जैसी बीमारियों को बढ़ावा दे सकता है, लेकिन संतुलित मात्रा में यह मस्तिष्क की सुरक्षा करता है, रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाता है और शरीर को अधिक सहनशील बनाता है।
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- लैक्टेट को खाकर ऊर्जा बनाते हैं गुड बैक्टीरिया
शोध में यह पाया गया है कि आंतों में रहने वाले कुछ अच्छे बैक्टीरिया लैक्टेट को खाकर ऊर्जा बनाते हैं, जिससे पाचन और रोग प्रतिरोधक क्षमता दोनों में सुधार होता है। डाॅ. नेहा का मानना है कि संतुलित लैक्टेट को 'आशा का अणु' कहा जा सकता है — जो आने वाले समय में कैंसर, संक्रमण और मेटाबॉलिक रोगों के इलाज की दिशा बदल सकता है।


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