लखनऊ। संपत्तियों के पंजीकरण से सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व देने वाले स्टांप एवं निबंधन विभाग के अपने ही निबंधन भवन की बिजली 65.44 लाख रुपये के बकाये पर काट दी गई। कैसरबाग स्थित निबंधन भवन का बिजली बिल करीब छह महीने से लंबित था। 31 अगस्त को सहायक महानिरीक्षक निबंधन प्रथम की ओर से जारी पत्र में भी कुल बकाया 65,43,933 रुपये दर्ज किया गया है। बिजली कटने के बाद फिलहाल कार्यालय का काम जनरेटर के सहारे चलाया जा रहा है।
मध्यांचल विद्युत वितरण निगम के बिल के मुताबिक, निबंधन भवन पर 62,61,872.27 रुपये पुराना बकाया है, जबकि 2,82,060.90 रुपये वर्तमान बिल है। बिल में भुगतान की अंतिम तारीख 27 अगस्त और संभावित विच्छेदन की तारीख तीन सितंबर दर्ज थी। इससे पहले ही भवन की बिजली काट दी गई। मामला सिर्फ बिजली बिल जमा नहीं होने तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि करीब छह महीने तक बकाया बढ़कर 62 लाख रुपये से अधिक कैसे पहुंच गया और इसकी जानकारी स्थानीय स्तर पर संबंधित अधिकारियों को क्यों नहीं हुई। अधिकारियों के मुताबिक, बिल के भुगतान की व्यवस्था केंद्रीकृत है। निबंधन भवन विभाग का होने के कारण इसका बिल केंद्रीय स्तर से जमा होता है। स्थानीय कार्यालय भुगतान नहीं करता है। इस केंद्रीकृत व्यवस्था के कारण स्थानीय स्तर पर बिल और बकाया की जानकारी नहीं मिल सकी।
किराये के कार्यालयों का बिल किराये में शामिल
एआईजी निबंध राजेश तिवारी ने बताया कि विभाग के भवनों के बिजली बिल के भुगतान की व्यवस्था केंद्रीकृत है। किराये के भवनों में संचालित कार्यालयों के बिजली बिल का भुगतान किराये के साथ ही किया जाता है। वहीं, निबंधन भवन विभाग का अपना भवन है, इसलिए इसका बिजली बिल केंद्रीय व्यवस्था के तहत जमा होता है। भुगतान जल्द कराया जाएगा।
असली संकट पुराना बकाया
अगस्त का वर्तमान बिल 2.82 लाख रुपये है, लेकिन कुल देनदारी में 62.61 लाख रुपये का पुराना बकाया है। यानी कनेक्शन कटने की वजह कई महीनों से भुगतान नहीं होना है। स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि निबंधन भवन प्रमुख कार्यालय है और यहां रोजाना बड़ी संख्या में संपत्तियों के दस्तावेज पंजीकृत होते हैं। ऐसे भवन की बिजली कटना केंद्रीकृत भुगतान व्यवस्था की निगरानी, सूचना तंत्र और जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।