अमरनाथ एक्सप्रेस से जब लखनऊ से लुधियाना रवाना हुए, ट्रेन अगले दिन सुबह बिल्कुल सही वक्त पौने पांच बजे अंबाला पहुंच गई। पर, यहां पता चला कि शंभू रेलवे स्टेशन (पंजाब-हरियाणा बॉर्डर) के ट्रैक पर किसानों का कब्जा है। ट्रेन डायवर्ट होकर चंडीगढ़ वाया लुधियाना जाएगी। ट्रेन में सवार लोगों को इसकी जानकारी नहीं थी। इससे होने वाली देरी का तो कोई अंदाज ही नहीं था।
असली जंग पंजाब में, एक चरण में मतदान
पंजाब में आखिरी चरण में एक जून को वोट डाले जाएंगे। अभी यहां प्रत्याशियों का एलान चल रहा है। आप और अकालीदल (ब) ने सभी 13 सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। भाजपा व बसपा 9-9 और कांग्रेस ने अभी 12 उम्मीदवार उतारे हैं।
इस तरह समझिए पार्टियों की रणनीति
भाजपा : हिंदू-शहरी पार्टी की छवि से बाहर आने की कवायद
सियासी पंडित बताते हैं कि ढाई दशक तक शिअद के साथ गठबंधन में रहकर 1 से 3 सीट जीतने वाली भाजपा बखूबी समझ गई है कि अगर उसे आगे जाना है, तो नए रास्ते खोजने होंगे। जब तीन कृषि कानूनों में एमएसपी के मुद्दे पर अकाली दल गठबंधन से बाहर हुई, तो भाजपा को जैसे मौका मिल गया।
भाजपा पर हिंदू पंजाबियों की सियासत करने का ठप्पा रहा है। यह शहरी पार्टी मानी जाती है। पटियाला के राजपुरा में मिले गुरजंट सिंह कहते हैं, अमरिंदर, रवनीत और तजिंदर जैसे सिख नेताओं को लाकर भाजपा हिंदू पार्टी की छवि से बाहर आने की कोशिश कर रही है। रिंकू व करमजीत को लाकर दलितों और जाखड़ के जरिये जाटों में सेंधमारी की कोिशश की है। जाखड़ को तो प्रदेश प्रधान ही बना दिया।
कांग्रेस : कई जगह अपनों से ही लड़ाई
2019 के आम चुनाव में अमरिंदर सिंह सीएम थे। तब कांग्रेस ने 13 सीटों में से 8 पर जीत दर्ज की थी। बाद में प्रदेश प्रधान बनाए गए नवजोत सिंह सिद्धू ने अमरिंदर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 2021 में चरणजीत सिंह चन्नी सीएम बनाए गए। दलित सीएम के प्रयोग से भी कांग्रेस 2022 में सत्ता नहीं बचा पाई। इसके बाद दिग्गजों के दलबदल का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अबतक जारी है। चुनौतियों के बीच प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग पर कांग्रेस को सफलता दिलाने की बड़ी जिम्मेदारी है।
शिरोमणि अकाली दल : कम नहीं चुनौतियां
अकाली दल के संस्थापक प्रकाश सिंह बादल के निधन और अकाली-भाजपा गठबंधन टूटने के बाद यह पहला आम चुनाव है। अकाली दल की गांवों में ठीक पैठ मानी जाती है। अकाली ने किसानों के नाम पर गठबंधन तोड़ा, लेकिन 2022 में इसका कोई फायदा नहीं दिखा। विधानसभा चुनाव में बसपा से हाथ मिलाने के बावजूद 117 विस सीटों में सिर्फ तीन जीत पाई। यह चुनाव सुखबीर बादल की सबसे बड़ी परीक्षा है।
बसपा : उत्तर प्रदेश की तरह कमजोर होती पकड़
दलितों के बड़े चेहरे कांशीराम ने यूपी में जाकर चार बार बसपा की सरकार बनवाई। पंजाब में करीब 32% आबादी दलितों की है। इनमें 60% सिख और 40% हिंदू हैं। तमाम प्रयासों के बावजूद कांशीराम इन्हें एकजुट नहीं कर पाए। दलितों का बड़ा समूह कांग्रेस व अकाली दल में बंटता रहा है। यूपी की तरह बसपा यहां भी अकेले लड़ रही है।
चुनावी गणित... ये भी बड़े मुद्दे
नशाखोरी : संगरूर के शेखा गांव (बरनाला) में मिले सुखदेव सिंह कहते हैं, कैप्टन ने गुरुग्रंथ साहिब पर हाथ रखकर कसम खाई थी कि पंजाब को नशामुक्त कर देंगे। पर, कुछ न हुआ। सत्ता से चले गए। अकाली दल भी इस मुद्दे पर कुछ नहीं कर पाई थी। नशामुक्ति का वादा सीएम मान ने भी किया, लेकिन स्थिति जस की तस है।
घटता जलस्तर : पंजाब यूनिवर्सिटी पटियाला के प्रो. जसविंदर बराड़ कहते हैं, तेजी से गिरता भूजल स्तर बड़ा मुद्दा है। साल में पानी का स्तर करीब एक मीटर नीचे जा रहा है। वजह, धान और गेहूं का यह सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। एक किग्रा धान तैयार करने में 5 हजार लीटर पानी खर्च होता है। यहां 14 लाख ट्यूबवेल हैं।
आर्थिक चुनौतियां : फसलों के नुकसान के एवज में किसानों को मुआवजा नहीं मिल पा रहा है। गारंटी के बावजूद महिलाओं को एक हजार रुपये महीने नहीं दे पाए। कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाल नहीं की जा सकी। 12% महंगाई भत्ता भी बकाया है। स्थिति यह है कि आज जो कर्ज ले रहे हैं, उसका 97 प्रतिशत हिस्सा पिछले कर्ज का ब्याज चुकाने में देना पड़ रहा है।
आप : 2022 जैसा प्रदर्शन दोहराने की चुनौती
कांग्रेस की कलह और किसानों के बड़े समर्थन की बदौलत आप 2022 में विधानसभा की 117 में से 92 सीटें फतह कर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई थी।