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Lucknow News: मकान में अकेले रह रहे बुजुर्ग की जिंदा जलकर मौत

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बुजुर्ग श्रीराम।
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लखनऊ। सआदतगंज के बावली चौकी के पास के अकेले रहने वाले श्रीराम शर्मा (80) की शनिवार तड़के मकान में जिंदा जलकर मौत हो गई। उनकी मौत कहने को तो महज एक हादसा है, पर बदलते परिवेश में अकेले रहने वाले बुजुर्गों और सगे संबंधियों के लिए एक सबक है। बीमारी और अकेलेपन ने श्रीराम को कमजोर बना दिया था। वर्ष 2017 में पत्नी की मौत हो गई। एक साल पहले बेटे परिवार के साथ अलग रहने लगे। लोगों में चर्चा है कि इस उम्र में उनकी देखभाल के लिए अगर कोई साथ मौजूद होता तो उनकी जान न जाती।
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श्रीराम अशोक चौधरी की जमीन पर दो कमरे के मकान में रहते थे। वे नाई का काम करते थे। शनिवार तड़के चार बजे लोगों ने उनके मकान से आग की लपटें और धुएं उठता देखा। इंस्पेक्टर बृजेश सिंह, टीम के साथ पहुंचे और लोगों की मदद से सबमर्सिबल से आग बुझाने लगे। सीएफओ मंगेश कुमार, एफएसओ हजरतगंज राम कुमार रावत भी दमकल की दो गाड़ियों के साथ पहुंच गए।



डेढ़ घंटे बाद दमकल कर्मियों ने आग पर काबू पा लिया। दमकल कर्मी मकान के अंदर गए तो उन्होंने देखा कि श्रीराम गैस चूल्हे पर मृत पड़े थे। शरीर 85 प्रतिशत तक जल गया था और गृहस्थी पूरी जल चुकी थी। कैंपबेल रोड निवासी श्रीराम के बेटे राजेंद्र के मुताबिक पिता काफी दिनों से बीमार थे। वह रोज सुबह चार बजे पानी गर्म करके पीते थे। आशंका है कि शनिवार को पिता, गैस चूल्हे पर पानी गर्म कर रहे होंगे। तभी दिल का दौरा पड़ने से गिर गए और जलकर उनकी मौत हो गई।
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बंद कराई गई बिजली आपूर्ति

इंस्पेक्टर ब्रजेश सिंह के मुताबिक मकान के गेट में अंदर से सिटकनी लगी थी। आग बुझाने के दौरान बिजली काटी गई थी। एफएसओ रामकुमार रावत के मुताबिक आग शॉर्ट सर्किट से लगी है। इंस्पेक्टर ने बताया कि साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।



मकान से प्यार इतना था कि बेटों के साथ रहना नहीं चाहते थे



मकान मालिक अशोक चौधरी ने बताया कि श्रीराम हंसमुख मिजाज के थे। वे हमेशा तड़के उठ जाते थे। पत्नी की मौत के बाद अकेले हो गए थे। चार बेटे राजेंद्र, राजू, राकेश और सुरेश हैं। बेटों की शादी श्रीराम ने की और दो कमरे का मकान परिवार के लिए छोटा पड़ने लगा। धीरे-धीरे बेटों ने अपना-अपना ठिकाना अलग कर लिया। श्रीराम अकेले रह गए। सुरेश की पत्नी रोज दोनों टाइम का खाना बनाने जरूर आती थी। अशोक का कहना है कि बीते कुछ दिनों से श्रीराम काफी बीमार थे। देखभाल करने वाला कोई नहीं था। बेटे श्रीराम को साथ चल कर रहने के लिए कहते भी थे, पर वह अपना मकान छोड़कर जाने के लिए राजी नहीं थे।
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