अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले भाजपा में यूं तो कई नेता है, लेकिन इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिनके फैससों से विवाद भी कम नहीं हुए है।
ऐसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त है, जो पार्टी फोरम पर तमाम निर्णय लिए जाने का दावा तो करते हैं लेकिन खुद ही उस पर अमल नहीं करते।
ये नेता कार्यकर्ताओं को संतोषी और अनुशासित बने रहने को कहते हैं लेकिन खुद विघ्न पैदा करते हैं। चुनाव प्रत्याशी अभी तय नहीं हुए लेकिन कई नेताओं ने खुद को उम्मीदवार घोषित कर प्रचार भी शुरू कर दिया है।
इन नेताओं के लिए न तो संसदीय बोर्ड के कोई मायने हैं और न ही सामूहिक फैसलों के। ये नेता कभी ज्यादा उम्र के लोगों को चुनावी जंग से दूर रखने की चर्चा पर चुप्पी साधते हैं, तो कभी खुद ही उनकी सीटें तय करने लगते हैं।
वे चुनाव जीतने के लिए सीट बदलने से लेकर दूसरी तिकड़मों से भी बाज नहीं आ रहे।
बिना फैसले के ही हरी झंडी देने में माहिर
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह 2009 में पहली बार गाजियाबाद सीट से जीतकर लोकसभा में पहुंचे थे।
वह कहते हैं कि प्रत्याशियों को लेकर फैसला संसदीय बोर्ड करेगा लेकिन कई सीटों पर पार्टी नेताओं को चुनाव लड़ने की हरी झंडी देने लगते हैं।
गाजियाबाद में ‘आप’ के इफेक्ट और सियासी समीकरण अनुकूल न होने के कारण वे अपनी सीट बदलना चाहते हैं। लखनऊ से चुनाव लड़ने की तैयारियां भी शुरू कर देते हैं।
लखनऊ, वाराणसी समेत कई सीटों पर उम्मीदवारों को बदले जाने की अटकलें लगाई जाती हैं, बुजुर्ग नेताओं को चुनाव लड़ाने से परहेज बरतने की चर्चाएं चलती हैं, लेकिन इन पर वे विराम नहीं लगाते।
ये चर्चाएं क्यों और कहां से आई, इसकी पड़ताल नहीं की जाती। संसदीय बोर्ड में चर्चा के बिना वरुण गांधी सुल्तानपुर चले जाते हैं, मेनका पीलीभीत शिफ्ट हो जाती हैं, लेकिन आम कार्यकर्ताओं के लिए यही शिगूफा रहता है, मेरा टिकट भी पार्लियामेंट्री बोर्ड ही तय करेगा।
धैर्य की सीख, पर जिद भी कम नहीं
पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह फिर विधिवत भाजपा में शामिल हो गए हैं। बड़े कद के नेता हैं। एटा से फिर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं।
वह भी कार्यकर्ताओं को धैर्य रखने की सलाह देते रहे हैं लेकिन पिछली बार कुछ टिकटों पर जिद को लेकर वह पार्टी छोड़ गए थे। वह बुलंदशहर से अशोक प्रधान को प्रत्याशी बनाए जाने का विरोध कर रहे थे।
राजनाथ सिंह उस समय भाजपा अध्यक्ष थे। तब प्रत्याशियों की पहली सूची में ही विवादित अशोक प्रधान का नाम शामिल था।
आखिरकार वे इसे बर्दाश्त नहीं कर पाए। कमोबेश यही हाल इस बार अलीगढ़ समेत तीन-चार सीटों पर है। वहां कल्याण सिंह प्रत्याशी तय करेंगे।
बेचैनी, तीखे तेवर और फिर सरेंडर
पार्टी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी इलाहाबाद से चुनाव लड़ते रहे हैं। वर्ष 2009 में अपनी इलाहाबाद सीट बदलकर वाराणसी का रुख किया।
वहां से सांसद चुने गए। वह इस सीट से फिर लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। बिहार और यूपी में मोदी इफेक्ट और प्रभावी बनाने के लिए भाजपा इस सीट से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी को उतारना चाहती है।
सीट बदले जाने की आशंका से जोशी बेचैन हैं। संसदीय बोर्ड की बैठक में अपने तीखे तेवर भी दिखा चुके हैं। पार्टी ने बुजुर्ग नेताओं के चुनाव न लड़ने का शिगूफा छोड़ा तो भी उन्होंने कोई पहल नहीं की।
खुद तय कर लेती हैं उम्मीदवार
मेनका गांधी केंद्र में मंत्री रह चुकी हैं। फिलहाल आंवला से सांसद हैं। वर्ष 2009 में अपने बेटे वरुण गांधी को पीलीभीत से चुनाव लड़ाने के लिए आंवला चली आई थीं।
विधानसभा चुनाव में मेनका और वरुण ने पीलीभीत में अपनी पसंद से टिकट दिलाए। सुखलाल धोबी जैसे पुराने नेताओं को किनारे कर दिया।
इस बार भी पार्टी अनुशासन और संसदीय बोर्ड के फैसलों के बिना मेनका पीलीभीत की पुरानी सीट पर चली गई हैं। आंवला का प्रत्याशी भी उन्होंने खुद तय कर दिया।
सीट पक्की नहीं, पहुंच गए प्रचार करने
वरुण गांधी पार्टी के युवा नेता। पार्टी अनुशासन की ज्यादा परवाह नहीं।
कई बार पार्टी लाइन से इतर राय रखकर चर्चा में आते हैं। पिछली बार पीलीभीत से जीते और इस बार सुल्तानपुर से चुनावी जंग में हैं।
उन्होंने चुनावी तैयारियां शुरू कर रखी हैं। यह अलग बात है कि संसदीय बोर्ड ने इस बारे में कोई फैसला नहीं किया है।
जुबां पर समर्पण, इशारों में विरोध
लालजी टंडन लखनऊ के सांसद हैं। एमएलए, एमएलसी और मंत्री भी रह चुके हैं।
प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के चुनाव न लड़ने पर वर्ष 2009 में लखनऊ से चुनाव लड़े और सांसद चुने गए। इतने पर भी संतोष नहीं। लखनऊ से बाहर जाने को तैयार नहीं। हों भी क्यों, यह सीट उन्हें विरासत में जो मिली है।
उनकी सीट पर राजनाथ सिंह लड़ना चाहते हैं लेकिन इशारों ही इशारों में उन्होंने विरोध जता दिया है। हालांकि जुमला अन्य नेताओं की तरह यही कि वे पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता हैं।
पहली बार ही बेकरारी
कलराज मिश्र भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। विधान परिषद सदस्य और राज्यसभा सांसद रह चुके हैं।
पहली बार लखनऊ पूर्व से विधायक चुने गए। वह कानपुर से चुनाव लड़ना चाहते हैं। हालांकि यह उनका पहला लोकसभा चुनाव होगा।
माना जा रहा है कि संसदीय बोर्ड की बैठक में कानपुर से उनकी उम्मीदवारी पर जल्द मुहर लग जाएगी।