66700 ई-रिक्शे हैं पंजीकृत, 54 हजार की फिटनेस नहीं
लखनऊ। राजधानी की सड़कों पर दाैड़ रहे 82 प्रतिशत ई रिक्शे अनफिट हैं। कभी भी हादसे का शिकार हो सकते हैं। यात्रियों की जान जोखिम में डालकर ये ई रिक्शे खुलेआम सड़कों पर चल रहे हैं। लखनऊ में पंजीकृत 66,700 ई-रिक्शों में 54 हजार ऐसे हैं, जिनकी फिटनेस नहीं है। न ही बीमा आदि है।
ऐसे में एक ओर से ई रिक्शों से शहरभर में जाम लग रहा है। वहीं दूसरी ओर हादसे की आशंका भी लगातार बनी हुई है। अनफिट ई-रिक्शा का इस्तेमाल कई जगह बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने में भी किया जा रहा है। दरअसल, शहर में चिनहट, कमता बसस्टैंड, अवध चौराहा, कैसरबाग, चारबाग, चिनहट, मुंशीपुलिया, पुरनिया, जानकीपुरम, चौक, डालीगंज आदि जगहों पर ई-रिक्शा के बेतरतीब संचालन से यातायात व्यवस्था चरमरा गई है। ई रिक्शा संचालक सवारियों के लिए कहीं भी वाहन रोक रहे हैं और जाम की वजह बन रहे हैं। जाम के साथ दुर्घटना की आशंका भी बढ़ गई है। लेकिन ऐसा होना लाजिमी है। लखनऊ में कुल 66700 ई रिक्शे पंजीकृत हैं। इसमें 54 हजार की फिटनेस नहीं है। जबकि ई रिक्शों की भी अन्य वाहनों की तरह फिटनेस जांची जानी चाहिए। लेकिन वाहन चालक फिटनेस नहीं करवाते, जिससे खस्ताहाल में ही ई रिक्शों को चलाया जा रहा है।
इसलिए नहीं करवाते फिटनेस
परिवहन विभाग के अधिकारी बताते हैं कि ई रिक्शों की फिटनेस के लिए संजीदगी नहीं बरती जाती। इसके पीछे वजह यह है कि 25 हजार रुपये की धनराशि देकर ई रिक्शे फाइनेंस करवा लिए जाते हैं। फिर प्रतिदिन चार से पांच साै रुपये की कमाई करने वाले ई रिक्शा संचालक फिटनेस पर होने वाले खर्च से बचते हैं। फिटनेस पर चार से पांच हजार रुपये खर्चना नहीं चाहते।
कार्रवाई करें, पर कहां खड़े करें सीज ई रिक्शे
परिवहन विभाग की प्रवर्तन टीम की अपनी मजबूरी है। अधिकारियों का कहना है कि सड़कों पर दैाड़ रहे अनफिट ई-रिक्शा के खिलाफ अभियान चलाया जाता है। वाहन भी सीज होते हैं। लेकिन उन्हें खड़ा करने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होने से कार्रवाई अधर में लटक जाती है। पुलिस चौकियों में जगह सीमित होने के कारण कई सीज ई-रिक्शों को वृंदावन स्थित पी-4 पार्किंग में भेजा जाता है।
आधिकारिक वर्जन
82 प्रतिशत ई रिक्शों की फिटनेस नहीं है। उनके खिलाफ चेकिंग अभियान चलाए जा रहे हैं। प्रवर्तन टीम ऐसे वाहनों के खिलाफ चालान व सीजर की कार्रवाई कर रही है। लेकिन यार्ड की कमी एक बड़ी समस्या है।
- प्रभात पाण्डेय, आरटीओ प्रवर्तन