राजधानी स्थित केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. आदर्श त्रिपाठी ने बच्चों को लेकर काफी अहम जानकारी साझा की। कहा कि कोई भी बच्चा गुमसुम रहे, अचानक गुस्सा करने लगे या घर में सामान तोड़ने-फोड़ने लगे तो उसे चिकित्सक को दिखाएं। लंबे समय तक यह प्रवृत्ति बनी रहने पर वह मानसिक दिव्यांग भी हो सकता है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. तरुण आनंद बताते हैं कि टीकाकरण की तरह ही बच्चों की मानसिक जांच भी जरूरी है। उसका बोलना, चलना और शारीरिक सक्रियता को परखा जाना चाहिए। इससे पता चलेगा कि कहीं वह मानसिक दिव्यांगता की ओर तो नहीं बढ़ रहा है।
समय पर इलाज शुरू होने से वह ठीक हो सकता है। मनोचिकित्सक डॉ. पारुल प्रसाद कहती हैं कि बच्चों को दवा के बजाय पुनर्वास के जरिये ठीक किया जा सकता है। उनका मानना है कि बच्चों की लाइफ स्टाइल और खानपान से उनके दिमाग की सक्रियता को सही दिशा दी जा सकती है।
इस संबंध में आहार विशेषज्ञ श्रुतिका चौधरी बताती है कि मानसिक और शारीरिक दिव्यांगता में खानपान की अहम भूमिका होती है। इसलिए काउंसिलिंग के बाद बच्चों को पोषक आहार की जरूरत होती है। ऐसा करके हम बच्चों को बेहतर बना सकते हैं।
मानसिक दिव्यांगता के खिलाफ शुरू हुई जंग में आहूति डालते हुए लखनऊ के ‘द होप फाउंडेशन’ द्वारा संचालित ‘द होप रिहैबिलिटेशन एंड लर्निंग सेंटर’ की तरफ से पूरे साल (तीन दिसंबर 2024 से तीन दिसंबर 2025) तक कैंप का आयोजन किया जाएगा। सेंटर के प्रबंध निदेशक दिव्यांशु कुमार ने बताया कि इस कैम्प के तहत कोई भी व्यक्ति या मरीज का फ्री अस्सेस्मेंट किया जाएगा।
सही जानकारी और सही इलाज के माध्यम से इससे जूझ रहे मरीज को ठीक कर समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है। दिव्यांशु कुमार ने बताया, हम प्रोफेशनल थेरापिस्ट की टीम के साथ इस मुहिम की शुरुआत कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य यही हैं कि नई पीढ़ी को मानसिक दिव्यांगता और मानसिक विकारों से निजात दिला सकें।