लखनऊ। लोग हमारा मजाक उड़ाते हैं, लेकिन दर्द कोई नहीं समझता। अस्पताल जाने पर डॉक्टर सोच में पड़ जाते हैं कि हमें पुरुष वार्ड में भर्ती कराया जाए या महिला में। अक्सर वे हमारे मामले में पेशाब की नली डालने के अभ्यस्त नहीं होते हैं। इन सब पीड़ाओं से गुजरना आसान नहीं होता। यह दर्द है किन्नर गुड्डन मां का। वह रविवार को एलजीबीटीक्यूआई समुदाय के मुद्दों पर हुई कार्यशाला में अपनी बात कहकर भावुक हो गईं। यह आयोजन लोहिया विधि विवि और सुरम्य फाउंडेशन की ओर से विवि परिसर में हुआ।
गुड्डन मां ने सुझाव दिया कि किन्नर समुदाय कि भलाई के लिए अस्पतालों के हर विभाग में किन्नर समाज के कुछ व्यक्ति रखे जाएं। उनके लिए अलग से वार्ड और ओपीडी की व्यवस्था हो। उन्होंने कहा, हमें समाज ही नहीं, अपने घरों में भी भेदभाव झेलना पड़ता है। हमारे अपने ही हमारी पहचान छिपाते हैं। घर पर भाई-बहन के लिए कोई रिश्ता आता तो मां बोलतीं कि कमरे में ही रहना...वरना शादी टूट जाएगी। गुड्डन ने बताया कि डालीगंज में वे ऐसे समुदाय के हर व्यक्ति को आसरा देती हैं। लंबी लड़ाई के बाद काफी अधिकार मिले हैं। अभी भी जागरूकता की जरूरत है।
ईश्वर का अपमान है इस समुदाय के साथ खराब व्यवहार
सेवानिवृत्त जिला जज डॉ. डीएन श्रीवास्तव ने कहा कि समलैंगिक, उभयलिंगी, ट्रांसजेंडर और विचित्र लोगों के लिए एक व्यापक शब्द एलजीबीटीक्यूआई या क्वीर समुदाय को समझने की जरूरत है। ईश्वर ने उन्हें ऐसा बनाया है। इसमें उनका कोई दोष नहीं है। उनके साथ खराब व्यवहार करना ईश्वर का अपमान करने जैसा है।
केजीएमयू की नर्सिंग शिक्षिका देबिना ने इंटरसेक्स और ट्रांसजेंडर के बीच के अंतर को समझाया। इंटरसेक्स वे हैं, जिनके लिंग के बारे में स्पष्ट स्थिति न हो। ट्रांसजेंडर वे होते हैं, जो लिंग के हिसाब से सामाजिक व्यवहार नहीं कर पाते हैं। मनोचिकित्सक डॉ. पवन गुप्ता ने कहा कि अस्पतालों में ट्रांसजेंडर क्लीनिक और वार्ड भी होने चाहिए। नीतू संजय ने सुरम्य फाउंडेशन के बारे में जानकारी दी। इस मौके पर एक्टिविस्ट जेरी, वरिष्ठ पत्रकार प्रांशु मिश्रा, प्रो. प्रेम कुमार गौतम और लोहिया विधि विश्वविद्यालय के कार्यकारी कुलपति प्रो. संजय सिंह ने एलजीबीटीक्यूआई समुदाय के कानूनी और सामाजिक पहलुओं पर चर्चा की।