लखनऊ। कान से बार-बार पस आना, दर्द और सुनाई कम देना क्रॉनिक ओटाइटिस के लक्षण हो सकते हैं। इसे सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज करने पर संक्रमण कान के पर्दे के पीछे से आसपास की हड्डी तक फैल सकता है। इससे सुनने की क्षमता प्रभावित होने का खतरा रहता है। यह जानकारी बलरामपुर अस्पताल के ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. हिमांशु प्रताप सिंह ने रविवार को अस्पताल में पहली बार आयोजित टेम्पोरल बोन डिसेक्शन कार्यशाला में दी।
उन्होंने बताया कि लंबे समय से कान में संक्रमण होने पर समय पर इलाज जरूरी है। दवाओं से संक्रमण नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन कान के परदे में छेद या हड्डी में संक्रमण होने पर सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। चिकित्सा विज्ञान में इसे टेम्पोरल बोन डिसेक्शन कहते हैं।
ईएनटी सर्जन डॉ. राजीव शर्मा ने बताया कि कान के अंदर चेहरे की नस, सुनने और संतुलन से जुड़ी महत्वपूर्ण संरचनाएं होती हैं। सर्जरी के दौरान इनकी जानकारी होने से जटिलताओं का खतरा कम किया जा सकता है।
लोहिया संस्थान के ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. आशीष चंद्र अग्रवाल ने बताया कि कोलेस्टीटोमा में कान के अंदर त्वचा और गंदगी की परत जमा होने से आसपास की हड्डी को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे मामलों में संक्रमण रोकने और सुनने की क्षमता बचाने के लिए सर्जरी जरूरी हो सकती है। कार्यक्रम में डॉ. मनीष चंद्रा, डॉ. एबी सिंह, केजीएमयू ईएनटी विभाग के डॉ. अनुपम मिश्र और डॉ. दीपिका द्विवेदी मौजूद रहीं।