सपा के पुराने रणनीतिकारों की मानें तो दिग्गजों की कमी भी हार की वजह बनी। पार्टी में यह परिपाटी रही है कि जिलेवार किसी न किसी पुराने नेता को जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। ऐसे नेता चुनावी प्रबंधन के धनबल, बाहुबल से लेकर हर फन में माहिर होते थे। इसके लिए पार्टी पहले से ही हर जिले में एक चेहरा रखती रही है। नए जमाने की सपा में इसका अभाव दिखता है। दूसरी तरफ पार्टी का प्रदेश नेतृत्व खुलकर मैदान में नहीं उतरा। सपा के 51 विधान परिषद सदस्य और 49 विधानसभा सदस्य हैं। ये सदस्य भी जिलों में करिश्मा नहीं दिखा पाए। हमीरपुर, जालौन में सपा मैदान में ही नहीं उतर पाई। खास बात यह है कि पार्टी के नीति निर्धारकों में शामिल दूसरी पंक्ति के नेता अपने जिले में नाकाम रहे। वे आसपास के हर जिले में सदस्यों को लामबंद करने का दावा करते रहे, लेकिन चुनाव परिणाम आया तो उनका दावा हवाई साबित हुआ। जिपं अध्यक्ष पद के उम्मीदवार चयन में सपा ने अल्पसंख्यक चेहरे से दूर रही। इसे भी रणनीति के तौर पर ठीक नहीं माना जा रहा है। क्योंकि इन्हें सपा के आधार वोट बैंक के रूप में देखा जाता है।
सपा के गढ़ में ‘अपनों’ ने बढ़ाईं मुश्किलें
जिपं अध्यक्ष के चुनाव में कभी सपा के रणनीतिकार रहने वालों ने बताया कि सैफई परिवार के गढ़ माने जाने वाले जिलों में उनके अपनों की नाराजगी भी भारी पड़ी है। फिरोजाबाद में सैफई परिवार के रिश्तेदार सिरसागंज विधायक हरिओम यादव की नाराजगी भारी पड़ी तो फर्रुखाबाद में सपा के पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह यादव की अनदेखी। नरेंद्र सिंह की बेटी मोनिका यादव बतौर निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में उतरीं और भाजपा ने समर्थन से विजेता बनीं। मैनपुरी में सपा के दो पुराने दिग्गजों की लड़ाई में तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारा गया। लेकिन एकजुटता नहीं बन पाई और हार का सामना करना पड़ा। औरैया में भी कमोबेश यही स्थिति रही।