लखनऊ। हाईकोर्ट ने केजीएमयू की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नीतू सिंह की बर्खास्तगी रद्द कर दी है। कोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच में आरोपों को साबित करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकलपीठ ने मंगलवार को दिए आदेश में कहा कि जांच समिति ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों को विधिवत साबित किए बिना ही निष्कर्ष निकाल दिया था। पीठ ने डॉ. सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें तत्काल सेवा में बहाल करने और बकाया वेतन सहित सभी परिणामी सेवा लाभ देने का आदेश दिया। हालांकि, न्यायालय ने केजीएमयू को नियमों के तहत उनके खिलाफ नए सिरे से विभागीय जांच करने की छूट भी दी है।
डॉ. नीतू सिंह केजीएमयू की मॉलिक्यूलर बायोलॉजी लैब में एसोसिएट प्रोफेसर (नॉन-मेडिकल) के पद पर कार्यरत थीं। उनके खिलाफ वर्ष 2020 में विभागीय कार्रवाई शुरू की गई थी। उन पर स्वास्थ्य परियोजना के प्रस्ताव, कथित बौद्धिक संपदा अधिकार और साहित्यिक चोरी से जुड़े विवाद सहित चार आरोप लगाए गए थे। जांच पूरी होने के बाद 10 जून 2020 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं।
डॉ. नीतू सिंह ने इस बर्खास्तगी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि जांच के दौरान आरोपों को प्रमाणित करने के लिए आवश्यक साक्ष्य विधिवत रिकॉर्ड पर नहीं लाए गए और न ही उन्हें निर्धारित तरीके से साबित किया गया।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जांच प्रक्रिया नियमों के अनुरूप नहीं होने के कारण बर्खास्तगी आदेश और उससे जुड़ी कार्रवाई को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
न्यायालय ने विश्वविद्यालय को डॉ. नीतू सिंह के जवाब दाखिल करने के चरण से जांच दोबारा शुरू करने की अनुमति दी है। यह नई जांच अनुशासन एवं अपील नियमावली के नियम-7 के तहत की जाएगी। यदि जांच समिति में कानूनी विशेषज्ञ को शामिल किया जाता है, तो डॉ. नीतू सिंह को भी कानूनी सहायता लेने का अधिकार होगा।