राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने आरोप लगाया कि स्मार्ट मीटर की आड़ में करोड़ों का खेल चल रहा है। हफ्ते में दो बार स्मार्ट प्रीपेड मीटर की समीक्षा करने वाला पावर कार्पोरेशन प्रबंधन व बिजली कंपनियां अपने पुराने मीटरों का खोज नहीं लीं। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन निजी घरानों जीएमआर, पोलरिस, जीनस एवं इनटैली स्मार्ट को लगभग 27342 करोड़ का आर्डर दिया गया है, वे सभी विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत की वजह से मनमानी पर उतारू हैं। इस मनमानी का खामियाजा प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश में सभी उपभोक्ताओं के घरों में स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगने हैं। ऐसे में इसी प्रकार का खेल चलता रहा तो एक बड़ा घोटाला सामने आएगा। गोंडा और बलरामपुर में जिस तरह से लेजर से डिस्प्ले डैमेज करके रीडिंग गायब की गई, यह साबित करता है कि जानबूझ कर खेल किया गया है।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने आशंका जताई है कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर घोटाले की आड़ में विद्युत वितरण निगमों का 1.15 लाख करोड़ का एरियर फंस सकता है। संघर्ष समिति ने यह भी आरोप लगाया है कि निजीकरण के लिए स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने के नाम पर बड़े पैमाने पर खेल हुआ है। इसकी किसी एजेंसी से जांच कराई जाए।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के पदाधिकारिरयों ने कहा कि जिस तरह से सीतापुर, गोंडा सहित अन्य स्थानों पर मामला सामने आया है, उससे बड़ी साजिश की गंध आ रही है। संघर्ष समिति ने कहा कि विद्युत वितरण निगमों का उपभोक्ताओं पर लगभग 1.15 लाख करोड का राजस्व बकाया है। कार्पोरेशन प्रबंध के अनुसार 1.10 लाख करोड का घाटा है। बकाया वसूल लिया जाए तो निगम करीब पांच हजार करोड़ के मुनाफे में आ जाएंगे। जिस तरह से करीब छह लाख मीटर अभी तक निगमों को लौटाए नहीं गए हैं और ज्यादातर की रीडिंग शून्य कर दी गई है, वह बड़े घोटाले का संकेत है। इसकी किसी एजेंसी से जांच कराई जाए। वर्ष 2017 के मापदंडों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में प्रति सबस्टेशन 20 कर्मचारी और शहरी क्षेत्र में 36 कर्मचारियों का नियम था। बड़े पैमाने पर संविदा कर्मचारियों की छंटनी हुई। अब शहरी क्षेत्र में प्रति सबस्टेशन 18:30 कर्मचारी और ग्रामीण क्षेत्र में प्रति सर्विस स्टेशन 12ः 5 कर्मचारी का मानक बनाकर संविदा कर्मी निकाले जा रहे हैं।