बलरामपुर अस्पताल में निजी पैथोलॉजी का धंधा खूब फलफूल रहा है।
नियम कानून ताक पर रखकर भर्ती मरीजों को जांच के लिए निजी पैथोलॉजी भेजा जा रहा है।
आलम यह है कि इमरजेंसी में भर्ती गंभीर से गंभीर रोगी को निजी पैथोलॉजी की डग्गामार एम्बुलेंस से जांच के लिए वहां ले जाया जाता है।
इसके लिए उनसे हजारों रुपये वसूले जाते हैं। हालांकि अस्पताल के स्टाफ, डॉक्टर और प्रशासनिक अधिकारी की निगाह में यह सामान्य सी बात है।
कैसे हुआ खेल
बृहस्पतिवार को बलरामपुर अस्पताल की इमरजेंसी वार्ड के बेड नंबर 14 पर भर्ती रायबरेली, डलमऊ के राम नवेल (55) को कुछ दिन पहले गंभीर चोट लग गई थी।
उनके समधी शिव राम ने बताया कि पहले उन्हें ट्रॉमा सेंटर ले गए जहां कुछ दिन इलाज चला उसके बाद बुधवार की रात करीब आठ बजे बलरामपुर अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया।
रामनवेल की गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें इमरजेंसी में भर्ती कर लिया गया।
सुबह इलाज करने वाले डॉक्टर ने मरीज को एमआरआई जांच कराने की सलाह दी और थोड़ी देर बाद 12 बजकर तीन मिनट पर प्राइवेट डग्गामार एम्बुलेंस अस्पताल पहुंच गई।
मरीज को बताए बिना निकाला इमरजेंसी से
इमरजेंसी में भर्ती मरीज को बिना किसी को बताए स्ट्रेचर पर बाहर लाया गया।
इमरजेंसी के बाहर खड़ी डग्गामार एम्बुलेंस में मरीज को लादा गया और उसे चौक स्थित एक पैथोलॉजी पहुंचा दिया गया।
वहां कई घंटे के इंतजार के बाद मरीज का नंबर आया तब जाकर मरीज की जांच हो सकी जिसके लिए परिवारीजनों को 5,210 रुपये चुकाने पड़े।
दोपहर करीब तीन घंटे बाद तीन बजे मरीज को फोर्स क्रूजर, डग्गामार एम्बुलेंस (यूपी30 टी 6087) वापस लेकर आई।
मुंह खोला तो बंद कर देते हैं इलाज
इलाज करने वाले डॉक्टर से लेकर निजी पैथोलॉजी के कर्मचारी तक मरीजों व उनके तीमारदारों को धमकी देते हैं कि अगर बाहर से जांच पर आपत्ति जताई तो इलाज बंद हो जाएगा।
गंभीर मरीजों के परिवारीजन मरीज की जान बचाने के लिए बेबस और लाचार हो जाते हैं और जैसे-तैसे व्यवस्था कर वो मरीज की जांच कराते हैं लेकिन कोई कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है।
तीमारदार भी डरकर कुछ नहीं बोलते हैं क्योंकि उन्हें इस बात का डर सताता है कि अगर सरकारी जांच के लिए बोला तो डॉक्टर इलाज ही नहीं करेंगे।
एमआरआई का क्या है नियम
बलरामपुर अस्पताल में एमआरआई जांच की सुविधा नहीं है। इसके लिए नियम है कि अस्पताल में भर्ती मरीज को एमआरआई जांच की आवश्यकता पड़ती है तो उसे लोहिया अस्पताल, मेडिकल कॉलेज या लोहिया संस्थान भेजा जा सकता है।
जहां महज दो से तीन हजार रुपये में जांच हो जाती है। मरीज को जांच के लिए अस्पताल की एम्बुलेंस से भेजा जाता है, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।
अस्पताल के कर्मचारियों के दलालों के नेटवर्क से जुड़ने के बाद कोई भी डॉक्टर किसी मरीज को जांच के लिए सरकारी अस्पतालों में नहीं भेजता है।
वो मरीजों को सीधे प्राइवेट पैथोलॉजी का रास्ता दिखा देते हैं और मरीज के परिवारीजन इलाज व जान बचाने के लिए सब कुछ सहने को तैयार रहते हैं।
टोल फ्री नंबर पर करें शिकायत
अगर कोई डॉक्टर जबर्दस्ती मरीज को बाहर से जांच कराने के लिए मजबूर करता है तो आप उसकी शिकायत स्वास्थ्य विभाग के टोल फ्री नंबर 18001805145 पर कर सकते हैं।
अगर जांच बाहर से लिखी गई है और उतना पैसा देने में असमर्थ हैं तो वो मामले की शिकायत अस्पताल के निदेशक, सीएमएस, या एमएस से कर सकते हैं।
एम्बुलेंस का लगता है जमावड़ा
बलरामपुर अस्पताल में मरीजों की बाहर से जांच कराने के लिए अस्पताल के बाहर ही पैथोलॉजी की एम्बुलेंस का जमावड़ा लगता है।
ड्राइवर को कॉल कर मरीज का पूरा ब्योरा बता दिया जाता है। गाड़ी पहुंचते ही मरीज को एम्बुलेंस जांच के लिए भेज दिया जाता है।
गार्ड भी नहीं लगाते अंकुश
जब भी किसी मरीज को बाहर जांच के लिए भेजना होता है, डग्गामार एंबुलेंस का इस्तेमाल किया जाता है।
बलरामपुर अस्पताल में प्राइवेट और निजी पैथोलॉजी की एम्बुलेंस दिनभर दौड़ती रहती हैं, लेकिन गार्ड इन पर जरा भी सख्ती नहीं करते हैं।
आलम ये है कि अस्पताल के वार्ड के बाहर एम्बुलेंस खड़ी होती हैं। लेकिन कोई कुछ नहीं बोलता। सवाल उठता है कि अस्पताल की सुरक्षा में इन गार्डों की आखिर ड्यूटी क्या है।