हर शहर का एक फ्लेवर होता है। जैसे, लखनऊ में चौक का है। तंग, मगर दिल को सुकून पहुंचाने वाली गलियां। स्वादिष्ट पकवान और लाजवाब धरोहरें। लेकिन किसी भी शहर केपर्यटन को विकसित करने में फिल्मों, विशेषकर छोटी फिल्मों का बहुत योगदान होता है।
यह कहना है ट्रेवेल कॉन्क्लेव में शामिल होने पहुंचे फिल्म निर्देशक नागेश कुकुनूर का। उन्होंने कहा कि टूरिज्म प्रमोशन को लेकर प्रदेश में फिल्मों की शूटिंग के लिए प्रदेश सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी की पहल अच्छी है। लेकिन मेरा प्रदेश में फिल्म शूट करने को लेकर कोई मूड नहीं है।
‘डोर’ सरीखी ऑफबीट फिल्में बनाने वाले निर्देशक नागेश ने कहा कि ऐसा नहीं है कि लम्बे अरसे तक निर्देशन से दूर रहा। इस दौरान शॉर्ट फिल्में बनाई हैं। जल्द ही ‘धनक’ रिलीज होने वाली है। संभवत: जनवरी तक।
नागेश का मानना है कि कॉमर्शियल फिल्में तो हर कोई बना सकता है, लेकिन सेंसिबल फिल्में कम लोग ही बना पाते हैं। इसलिए कॉमर्शियल सिनेमा से दूरी बनाकर रखता हूं। आगे कहा कि लखनऊ पहली बार आना हुआ है, लेकिन यहां के कुछ इलाके घूमकर ही शहर की तासीर से परिचित हो गया।
भारत की ओर से ऑस्कर के लिए आधिकारिक तौर पर भेजी गई फिल्म 'कोर्ट’ को लेकर उठे विवादों पर निर्देशक नागेश कुकुनूर ने कहा कि ऑस्कर केलिए भेजी जाने वाली हर फिल्म पॉलिटकल एंट्री होती है। इससे पहले के उदाहरणों को ही देख लीजिए, कितने विवाद उठते रहे हैं।