केंद्र में भाजपा सरकार बनते ही केंद्रीय योजना आयोग का वजूद खतरे में आ गया। मोदी सरकार ने इसे अप्रभावी मानकर समाप्त करने की घोषणा कर दी, लेकिन यूपी का योजना आयोग तो पहले से ही निष्किय है। भारी भरकम संस्था सफेद हाथी ही साबित हो रहा है। साढ़े सात साल में कुल एक बैठक हुई, वह भी रस्मआदयगी।
इस बैठक में क्या विचार हुआ और क्या फैसले लिए गए, किसी को कुछ भी पता नहीं। बावजूद इसके इस पर हर माह लाखों रुपये फुंक रहे हैं। राज्य योजना आयोग के पदेन अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं, लेकिन सारा कामकाज उपाध्यक्ष के निर्देशन में होता है।
उपाध्यक्ष को सरकार लालबत्ती के साथ-साथ कैबिनेट मंत्री का दर्जा देती है। पूर्व मुख्य सचिव नवीनचंद्र वाजपेयी ढाई साल से इस आयोग के उपाध्यक्ष हैं। प्रशासनिक दक्षता के साथ सियासी कौशल के ‘मास्टर’ वाजपेयी की विशेषज्ञता से आयोग का काम नहीं बना तो सरकार ने राज्यमंत्री का दर्जा देकर एक सलाहकार भी आयोग में बना दिया।
मगर सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी मिली है उससे लगता है कि राज्य योजना आयोग सिर्फ दिखावे के लिए है।
पर, आयोग पर सीएम का भरोसा कायम
मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों विभिन्न विभागों से जुड़े निगमों व संस्थाओं के करीब 80 दर्जाधारी मंत्रियों व सलाहकारों को हटाया तो लगा लगा कि संवैधानिक आयोगों के अध्यक्षों का भी नंबर आएगा लेकिन उन्हें बरकरार रखा गया। संदेश गया कि सीएम का भरोसा इन पर कायम है।
बसपा सरकार में आयोग की एक भी बैठक नहीं
सूचना अधिकार के तहत मिली जानकारी पर भरोसा करें तो राज्य योजना आयोग की 2007 से 2012 के बीच कोई बैठक नहीं हुई। उस समय बसपा की सरकार थी।
सूचना मांगी गई थी कि आयोग की जनवरी 2007 से 12 सितंबर 2012 के बीच कितनी बैठकें हुईं? क्या निर्णय हुए? कौन-कौन उपस्थित रहा? जवाब मिला सिर्फ एक बैठक हुई। बैठक की तारीख दो जुलाई 2012 बताई गई। तब तक सपा की सरकार बन चुकी थी।
एक बैठक भी रस्मी
सत्ता आने पर संदेश देने का मकसद रहा हो या और कुछ। सपा सरकार ने अपने ढाई साल में कुल जमा एक ही बैठक की। यह बैठक प्रदेश की बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) तथा 2012-13 की वार्षिक योजना को अंतिम रूप देने के लिए बुलाई गई थी।
आरटीआई में जवाब में मिला कि इस बैठक में दोनों ही योजनाओं को अंतिम रूप दिया गया। मगर, इस बैठक की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि इसमें हुए विचार-विमर्श और लिए गए निर्णय का एक कार्यवृत्त तक तैयार नहीं किया गया।
आयोग के उपाध्यक्ष व सलाहकार को मिलती हैं ये सुविधाएं
- मानदेय: 40 हजार रुपये प्रतिमाह
- जलपान खर्च: उपाध्यक्ष को 10 हजार व सलाहकार को 7500 रुपये महीने
- आवास: सरकारी आवास अथवा अपने घर रहने पर 10 हजार रुपये महीना भत्ता।
- दैनिक भत्ता: आयोग के काम से यात्रा पर प्रदेश के भीतर 600 रुपये प्रतिदिन, प्रदेश के बाहर यात्रा पर 750 रुपये प्रतिदिन दैनिक भत्ता।
- ड्राइवर सहित एक स्टफ कार, पेट्रोल की सुविधा।
- कार्यालय व आवास पर एक-एक टेलीफोन।
- एक निजी सचिव, एक वैयक्तिक सहायक, दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी।
- आयोग के काम से रेल यात्रा करने पर उच्चतम श्रेणी में एक कूपे की तथा हवाई यात्रा में एक सीट।
- उपाध्यक्ष व सलाहकार के साथ उनके परिवारीजनों को इलाज की सुविधा।
इसलिए गठन किया गया आयोग का
- राज्य के भौतिक, वित्तीय व जनशक्ति का अनुमान लगाना तथा विकास में इनके उपयोग पर सुझाव देना।
- राष्ट्रीय योजना के उद्देश्यों एवं प्राथमिकताओं के साथ राज्य के क्षेत्रवार अल्पकालीन व दीर्घकालीन योजनाएं बनाना।
- राज्य के विकास में बाधक कारणों की पहचान करना और समाधान ढूंढ़ना।
- राज्य के क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए नीतियों व कार्यक्रमों का सुझाव देना।
- आयोजनागत कार्यक्रमों की प्रगति की समीक्षा करना।
- नियोजन एवं विकास की प्रणाली में जरूरी बदलाव को सामने लाना।
1972 में राज्य योजना आयोग का हुआ था गठन
प्रदेश में 1972 के पहले राज्य नियोजन परिषद हुआ करती थी। सरकार ने 24 अगस्त 1972 को इस परिषद को समाप्त कर आयोग का गठन किया। मूल आयोग में मुख्यमंत्री को अध्यक्ष व वित्तमंत्री को उपाध्यक्ष बनाने की व्यवस्था थी।
इसके अलावा राज्य नियोजन मंत्री, एक अवकाश प्राप्त प्रमुख अभियंता, लखनऊ विश्वविद्यलाय के उपकुलपति, किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल (वर्तमान में केजीएयू वीसी), पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के उप कुलपति को सदस्य बनाया गया था।
मुख्य सचिव, अध्यक्ष राज्य विद्युत परिषद, वित्त सचिव, प्रमुख अभियंता सिंचाई, सचिव नियोजन व एक अन्य को सदस्य बनाया गया था। कृषि विशेषज्ञ व अर्थशास्त्री को अलग से नामित करने की बात कही गई थी।
वित्त मंत्री की जगह बाहरी होने लगे उपाध्यक्ष
राज्य योजना आयोग यह तो नहीं स्पष्ट कर पा रहा है कि आयोग का उपाध्यक्ष वित्तमंत्री के स्थान पर बाहरी व्यक्ति को नामित करने की शुरुआत कब हुई।
मगर, इस समय आयोग में पूर्व आईएएस अधिकारी नवीन चंद्र वाजपेयी इसके उपाध्यक्ष हैं। मूल आयोग में वित्त मंत्री व राज्यमंत्री नियोजन के अलावा किसी अन्य मंत्री को शामिल नहीं किया गया था। मगर, बाद में सरकार ने पांच मंत्रियों को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया।
वर्तमान में कैबिनेट मंत्री मो. आजम खां, राम गोविंद चौधरी, अहमद हसन, बलराम यादव व शिवपाल सिंह यादव आयोग के विशेष आमंत्रित सदस्य हैं। देवेंद्र मणि द्विवेदी व निहाल अजमत चौधरी इसके गैर सरकारी सदस्य हैं।
हाल ही में सरकार ने प्रो. सुधीर कुमार पंवार को आयोग का सदस्य नामित किया है। प्रो. पंवार लखनऊ विश्वविद्यालय के शिक्षक हैं।