जो जीते हैं उनके लिए भी और जो हारे हैं उनके लिए भी यह नतीजे अप्रत्याशित हैं। कमियों से सबक न लेना ही हार का कारण बना है। जो रिजल्ट आया है, उससे दिख रहा है कि यह रिजल्ट दिल्ली के आम लोगों की जुबान पर काफी पहले से ही रहा होगा।
आखिर वहां के नेता व नेतृत्व इसे क्यों नहीं समझ पाए। इससे पता चलता है कि जनता व कार्यकर्ताओं की मन:स्थिति व नेतृत्व की मन:स्थिति में दूरी बढ़ी है। यूपी में 12 साल से चुनाव हार रहे हैं। पांच चुनाव में पराजय मिली है।
भाजपा के पूर्व अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह कहते हैं कि सबक नहीं लेंगे तो चीजें इसी तरह सामने आएंगी। लोकसभा चुनाव में लोगों ने कांग्रेस से घोर नाराजगी के कारण मोदी को विकल्प के रूप में प्रचंड बहुमत दिया था।
दिल्ली में उसी तरह की नाराजगी के कारण ‘आप’ को प्रचंड बहुमत दे दिया। जिस दल का नेतृत्व जनता व अपने कार्यकर्ताओं की धड़कन समझने में उदासीन रहेगा तो यही परिणाम दिखेंगे।
व्यक्तिवाद रहा तो यूपी में भी यही हाल
भाजपा के पूर्व संगठन मंत्री कहते हैं कि संगठन पर ‘कूड़ा लोगों’ को लादने के फैसले को सबक मिला है। जवाब देना चाहिए कि हरियाणा, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर और झारखंड में मुख्यमंत्री न घोषित करने वाले रणनीतिकारों को दिल्ली में क्यों किरन बेदी को मुख्यमंत्री का दावेदार घोषित करना पड़ा।
साफ है चाटुकारों व दलबदलुओं के सहारे नहीं जीता जा सकता। व्यक्तिवाद पर चलना बंद न हुआ तो यूपी में भी दिल्ली जैसा हाल होगा। इन प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करें तो कहा जा सकता है कि दिल्ली में भाजपा को ‘आप’ ने नहीं बल्कि उसके अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी ने हराया है।
कार्यकर्ताओं के मन और नेताओं के निर्णयों में चल रहे संघर्ष ने भाजपा को न सिर्फ आसमान से जमीन पर ला पटका बल्कि कई राज्यों में जीत से बने माहौल पर भी पानी फेर दिया। दिल्ली के नतीजे ने भाजपा नेताओं को दलबदलुओं को बागडोर सौंपने या उनके हाथों में पूरी बागडोर सौंपने जैसे प्रयोगों से बाज आने की नसीहत भी दी है।
दिल्ली से दूर नहीं है यूपी
नतीजे भले दिल्ली के हैं लेकिन इनमें यूपी के लिए सबक व संदेश इसलिए छिपे हैं क्योंकि न सिर्फ दोनों राज्यों की सीमाएं जुड़ी हैं बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सूबे का बहुत सारा पश्चिमी हिस्सा शामिल है।
दिल्ली में रहने वालों में यूपी के लोगों की भी बहुत बड़ी तादाद है। यूपी के लिए इन नतीजों का मतलब इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद यूपी इकाई के नेताओं की चाल-ढाल भी केंद्रीय नेताओं जैसी ही है।
नतीजे बताते हैं कि निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, नेताओं के मनमाने फैसले किसी भी पार्टी को निरंतर सफलता नहीं दिला सकते। भाजपा के एक नेता कहते भी हैं कि दिल्ली में आप की जीत नहीं बल्कि हमारी हार हुई है।
इस हार में भाजपा कार्यकर्ताओं की अपने नेताओं व उनकी निर्णयों को लेकर नाराजगी भी छिपी दिखाई दे रही है। यह बात इसलिए भी साबित होती है क्योंकि किरन बेदी को न सिर्फ पराजय का सामना करना पड़ा बल्कि वह सीट भी गवानी पड़ी जो भाजपा अभी तक कभी नहीं हारी थी।
सबक लेती नहीं दिखती यूपी भाजपा
महत्वपूर्ण पद संभालने वाले भाजपा के एक नेता कहते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी कहा करते थे कि अति आत्मविश्वास ही भाजपा को ले डूबता है। पार्टी को दूसरे लोग नहीं बल्कि खुद अपने ही कार्यकर्ता हराते हैं। नेताओं पर कार्यकर्ताओं का भरोसा टूटता है तो हमारी नैया डूब जाती है।
ब्याज के लालच में मूलधन को दांव पर लगाने वाला साहूकार कभी अपनी पूंजी नहीं बढ़ा सकता। जमीनी सच्चाई को स्वीकार कर रणनीति बनाने से ही संगठन को मजबूत बनाया जा सकता है। वह कहते हैं, भाजपा इस नसीहत को भूल गई। इसी कारण दिल्ली में हार हुई। यूपी भी उसी राह पर जा रहा है।
लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की भाजपा के फैसलों पर नजर डालें तो यह बात साबित भी होती है। सारे फैसले ऊपर से थोपे जाने लगे हैं। कई ऐसे लोगों को शामिल कर लिया गया जो पार्टी के पुराने नेताओं से भिड़ते रहे हैं।
यही नहीं, सबे में भाजपा के 12 विधायकों के सांसद बनने से विधानसभा की खाली सीटों पर हुए उपचुनाव को लेकर प्रत्याशियों के चयन के लिए प्रदेश में कोई बैठक बुलाने की जरूरत ही नहीं समझी गई। नतीजतन, उपचुनाव में पार्टी ने नौ सीटें गवां दीं। पर, मनमाने फैसले जारी रहे।
मनमाने फैसलों की बन गई परंपरा
छावनी परिषद के चुनाव में जमीन देखनी पड़ी। पर, नेता दावे करते रहे कि हवा उनके पक्ष में है। विधान परिषद प्रत्याशियों का फैसला ऊपर से हो गया। पार्टी को पता था कि अपने 41 विधायकों के बल पर सिर्फ एक उम्मीदवार जीत सकता है, फिर भी दो उम्मीदवार उतार दिए गए। एक की हार ने फजीहत करा दी।
भाजपा के झुग्गी झोपड़ी प्रकोष्ठ के पूर्व राष्ट्रीय सह संयोजक सुली भराला कहते हैं कि ‘उधार के हथियारों से जंग नहीं जीती जाती’, दिल्ली के चुनाव नतीजों ने अटलजी की इस कविता की याद दिला दी है।
साफ है कि बाहरी लोगों से पार्टी का परचम नहीं फहराया जा सकता। काडर पर ही भरोसा करना होगा। जो बाहर से आते हैं, उन्हें पांच साल कार्यकर्ताओं के बीच काम करने, संवाद और तालमेल बनाने का काम सिखाया जाए।
बहरहाल दिल्ली की हार को भी कार्यकर्ता चुनौती के रूप में लेकर 2017 में यूपी में पार्टी का परचम फहराएगा लेकिन भाजपा को प्रयोगशाला बनाने पर विराम लगा दिया जाए।
अहंकार और हिटलरशाही की हार
लखनऊ के जिला उपाध्यक्ष अवधेश कुमार सिंह कहते हैं कि हार भाजपा की नहीं हुई। उस अहंकार और हिटलरशाही की हुई, जो कार्यकर्ताओं को मजदूर व खुद को मालिक समझते हैं। जब संघर्ष का समय होता है तो कार्यकर्ताओं को सोने-चांदी जैसा बताते हैं। पर, जब टिकट देने का मौका आता है तो दलबदलुओं को गले लगाने लगते हैं।
48 घंटे के भीतर दिल्ली में किरन बेदी जैसों को लाकर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान कर देते हैं। इसमें सुधार न हुआ तो 2017 में यहां भी वैसा ही कुछ होने वाला है जो दिल्ली में हुआ है।
वहीं पार्टी के एक पूर्व राष्ट्रीय पदाधिकारी का कहना है कि अब तो समझ लेना चाहिए कि लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा की भारी जीत किसी नेता की नीति या रणनीति का परिणाम नहीं थी। दुर्भाग्य से कुछ नेताओं ने उसे अपनी नीति, रणनीति और निर्णयों की जीत मान ली। उसी लिहाज से फैसले लेने लगे।
दिल्ली में किरन बेदी जैसों का आना और उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करना इसी का उदाहरण है। यूपी के उपचुनाव में भी प्रदेश की चुनाव समिति में राय-मशविरा के बगैर प्रत्याशियों के फैसले हो गए थे। विधान परिषद सीटों के लिए प्रत्याशियों का फैसला दिल्ली दरबार से हुआ।