गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक मेडिकल कॉलेज (जीएसवीएम) कानपुर में तैनात डॉक्टर के आईसीआईसीआई बैंक अकाउंट से 2,42,394 रुपये निकल गए। डॉक्टर ने बैंक और आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल के अफसरों के खिलाफ हजरतगंज कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराई है।
आरोप है कि बैंक ने उनके नाम से नौ फर्जी इंश्योरेंस पॉलिसी कर ऑनलाइन रुपये ट्रांसफर कर लिए। शिकायत पर बैंक की सीईओ चंदा कोचर ने कस्टमर की गलती बताते हुए पल्ला झाड़ लिया। राजाजीपुरम निवासी कैंसर सर्जन मो. अतहर पहले केजीएमयू में तैनात थे।
वर्ष 2009 में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर कानपुर स्थित जीएसवीएम से जुड़ गए। इससे पहले राजधानी में तैनाती के दौरान आईसीआईसीआई बैंक की हजरतगंज शाखा में अकाउंट खुलवाया था। शुरू में इस अकाउंट का उपयोग डीमैट के लिए किया, लेकिन बाद में बंद कर दिया।
बैंक ने नहीं दिया पॉलिसी नंबर
नवंबर में बैंक की तरफ से किसी ने फोन कर अकाउंट में कुछ समस्या होने की जानकारी दी। अतहर के बैंक पहुंचने पर इंश्योरेंस पॉलिसी का भुगतान न होने की जानकारी दी गई। इस पर उन्होंने बैंक से कभी कोई पॉलिसी न लेने की बात कही। जबकि बैंक अफसर ने आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल से नौ पॉलिसी खरीदे जाने की बात कही।
हालांकि, पॉलिसी का नंबर मांगने पर बैंक अफसर बगलें झांकने लगे। कोई स्पष्ट जवाब न मिलने पर उन्होंने अपने अकाउंट का स्टेटमेंट निकलवाया। प्रीमियम के रूप में खाते से 2,42,394 रुपये ऑनलाइन निकलने का पता चला।
इसके बाद उन्होंने बैंक की सीईओ चंदा कोचर से फोन पर बातचीत की।कोचर ने पूरा ब्यौरा भेजने की बात कहते हुए दस दिन का वक्त मांगा। हालांकि, दस दिन बाद बैंक की तरफ से आए ई-मेल में अतहर को ही जिम्मेदार ठहराते हुए अफसरों ने पल्ला झाड़ लिया।
इसके बाद अतहर ने हजरतगंज कोतवाली में आईसीआईसीआई बैंक की हजरतगंज शाखा के मैनेजर और आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल के अफसरों के खिलाफ धोखाधड़ी की धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई।
बांड मिले न एसएमएस अलर्ट आया
पीड़ित डॉक्टर के अनुसार उन्होंने आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल से कभी कोई पॉलिसी नहीं ली। इसके बाद भी बैंक ने 15 से 20 साल की नौ पॉलिसी उनके नाम बेच दी और उन्हें पता तक नहीं चला।
पॉलिसी लेने पर बैंक या कंपनी की तरफ से बांड दिया जाता है, डॉक्टर अतहर को कोई बांड भी नहीं मिला। उन्होंने फर्जीवाड़े में बैंक अफसरों की मिलीभगत की आशंका जताई है।
डॉक्टर के अनुसार अकाउंट से एक रुपये का भी ट्रांजेक्शन होने पर एसएमएस अलर्ट आता है। पॉलिसी के प्रीमियम के तौर पर करीब ढाई लाख रुपये निकलने के बावजूद एक भी एसएमएस अलर्ट नहीं आया।
आरोप है कि ऐसा बैंक अधिकारियों की मिलीभगत के बिना मुमकिन नहीं। अफसरों ने ऐसी व्यवस्था की होगी कि रुपये निकलने का एसएमएस न पहुंचे।