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52 फीसदी बच्चे यौन उत्पीड़न के शिकार: रिपोर्ट

Sat, 27 Sep 2014 03:42 AM IST
अतुल भारद्वाज/अमर उजाला, लखनऊ
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देश में 52 फीसदी बच्चे किसी न किसी रूप में यौन उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं। यह चौंकाने वाली बात सामने आई है महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की स्टडी में। यही नहीं बच्चों को स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल पाने से पांच साल तक के प्रति हजार बच्चों में से 52 बच्चे डायरिया और निमोनिया से दम तोड़ देते हैं। जबकि बांग्लादेश जैसे देश में यह दर भारत से काफी कम है। कोख में बच्चियों का कत्ल करने का सिलसिला थम नहीं रहा।
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यही सब मुद्दे उठे स्कोर, एक्शन एड, जन पैरवी मंच के साथ एम लखनऊ संस्था की जनसुनवाई कार्यक्रम में। इस मौके पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की अध्यक्ष कुशल सिंह ने लड़कियों की घटती संख्या पर चिंता जताई। कुशल सिंह ने जनसुनवाई कार्यक्रम में कहा कि लड़कियों की संख्या में कमी आने का मतलब यह भी है कि हम लड़कियों से जिंदा रहने का अधिकार छीन रहे हैं। इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

आखिर सरकार बच्चियों की कोख में कत्ल होने पर क्यों नहीं रोक लगा पा रही है। बच्चों के अधिकार को मुद्दा बनाने के लिए लोग सामने नहीं आते। सरकार भी इस मुद्दे पर गंभीर नहीं दिखती। कभी-कभी तो एनसीपीसीआर की बात तक नहीं सुनी जाती। इसके खिलाफ सभी को मिलजुलकर लड़ाई लड़नी होगी, जिससे बच्चों की जिंदगी को बेहतर बनाया जा सके।
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शिक्षा के अधिकार कानून में बढ़े उम्र का दायरा

शिक्षा के अधिकार कानून पर कुशल सिंह ने कहा कि यह मुद्दा बच्चों के दूसरे अधिकारों से सीधे जुड़ा है। हमने सरकार से सिफारिश कर शिक्षा के अधिकार कानून में कुछ बदलाव करने की गुजारिश की है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण 6-14 साल के उम्र की कवरेज को बढ़ाकर 6-18 साल करना।

इसके अलावा प्री-स्कूल एजूकेशन को भी कानून के दायरे में लाने, और गरीब बच्चों का 25 फीसदी कोटा पहली से आठवीं कक्षा तक लागू रहने की सिफारिश की गई है। अभी इस कोटा में एडमिशन एंट्री लेवल यानी पहली कक्षा में ही मिलता है। अगर बीच में कोई बच्चा एडमिशन लेना चाहे तो संभव नहीं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव डॉ. शरतचंद बेहर ने की। वहीं एनसीपीसीआर की सदस्य नाहिद लारी खान, आरटीई फोरम के संयोजक अंबरीश राय, नेशनल कोएलिशन फॉर एजूकेशन केसंयोजक डॉ. रमाकांत राय मौजूद रहे।

बच्चों के खेलने के मैदान तो छोड़ो
कुशल सिंह ने कहा कि बच्चों के खेलने के मैदान सरकारी अधिकारी भू माफिया को बेचे दे रहे हैं। बच्चे अपने खेल के मैदान के लिए लड़ नहीं सकते। सरकार को गंभीर होना पड़ेगा। अभी हाईकोर्ट ने बच्चों के खेल के मैदान को किसी दूसरे उपयोग में लेने पर पूरी तरह ही रोक लगा दी है।

पीट दिया तो क्या, रवैया ठीक नहीं

बच्चों को पीटकर समझाने के तरीके पर कुशल सिंह ने सवाल उठाए। उनका कहना था कि बच्चा इससे सुधरेगा या नहीं, यह तो तय नहीं, लेकिन इसके बाद वह यह जरूर सीख जाएगा कि अपने से कमजोर को दबाने के लिए पीटना जरूरी है। यह उसके मन में क्राइम को ही बढ़ावा देने का काम करेगा। इस तरीके को बिल्कुल ही छोड़ दें।

स्कूलों में टीचर तक नहीं
जनसुनवाई में आठ साल की गौरी ने अपने स्कूल की समस्या बताई। उसका कहना था कि हमें जमीन पर बैठकर पढ़ना होता है। वहीं स्कूल में कभी-कभी तो एक भी टीचर नहीं आते। वहीं अजय कुमार ने बताया कि उसके पूरे स्कूल में केवल एक ही टीचर है। उसी के जिम्मे सभी क्लास चलती हैं। हम कैसे पढ़ें?

बच्चों को गाली बकते हैं
बलिया से आई एक महिला ने गुस्से में कहा कि ऐसे टीचर हमारे बच्चों को क्या सिखाएंगे जोकि खुद ठीक से नहीं बोलते। बच्चों से स्कूल में ऐरे, ओरे जैसे शब्दों के साथ गालियों से संबोधन किया जाता है। मुझे नहीं लगता कि हिंदी में ऐसे कोई शब्द भी हैं। इन पर पहले नियंत्रण किया जाए।
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कैसे सुधरेगी शिक्षा

.61 प्रतिशत है प्राइमरी स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति जबकि निजी स्कूलों में उपस्थिति 81 प्रतिशत तक होती है
.73 प्रतिशत स्कूलों में आरटीई के मानदंडों को पूरा करने वाले शिक्षक नहीं

.11 प्रतिशत स्कूलों में केवल एक क्लासरूम
.14 प्रतिशत में ही सभी पांच कक्षाएं

.7 प्रतिशत स्कूलों में ही पीने केपानी की सुविधा
.31 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में लड़कियों को टॉयलेट नहीं
(यह सर्वे स्कोर संस्था ने किया।)
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