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आखिर बैंक ने क्यों दबाई थी जाली नोटों की बात

Wed, 09 Apr 2014 03:30 PM IST
विवेक त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ
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चेस्ट में करोड़ों के जाली नोट मिलने के मामले में आईसीआईसीआई बैंक खुद शक के दायरे में है।
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पुलिस अफसर बड़े घोटाले की आशंका जता रहे हैं। सवाल है कि अगर जाली करेंसी फरवरी 2006 से मार्च 2013 के बीच की है तो अब तक एफआईआर क्यों नहीं कराई गई?

बैंक के अफसर इसे आठ साल के दौरान मिली करेंसी बता रहे हैं,लेकिन चुनावी बेला में इतनी बड़ी मात्रा में जाली नोटों ने तूफान ला दिया है।

पुलिस भी इस केस में फूंक-फूंककर कदम रख रही है। चर्चा है कि जाली करेंसी के इस मामले को जांच के लिए एटीएस या सीबीआई को दिया जा सकता है।

आईसीआईसीआई बैंक के अफसर इसे रुटीन प्रक्रिया बता रहे हैं। हालांकि एफआईआर इतने विलंब से क्यों हुई?इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

गोखले मार्ग स्थित आईसीआईसीआई बैंक के करेंसी चेस्ट में नकली नोटों के रूप में 10,77,87,840 रुपये मिलने का खुलासा‘अमर उजाला’ने मंगलवार के अंक में किया था।

बैंक के रीजनल हेड (करंसी ऑपरेशंस उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड) मनीष पांडे ने इस मामले में हजरतगंज कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराई थी। बैंक सूत्रों के अनुसार फरवरी 2006 से मार्च 2013 के बीच जमा हुई करेंसी की जांच में कुल 3,26,422 जाली नोट पाए गए।
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इनकी कीमत करीब 11 करोड़ 43 लाख 86 हजार 230 रुपये थी। इसमें से कुछ जाली करेंसी की एफआईआर पहले कराई जा चुकी थी।

रविवार को बाकी करेंसी की रिपोर्ट लिखाई गई। हालांकि,जाली करेंसी मिलने के पीछे पुलिस बैंक के करेंसी चेस्ट के भीतर किसी बड़े घोटाले की आशंका जता रही है।

पुलिस इसे सिद्धार्थनगर के डुमरियागंज स्थित एक राष्ट्रीय बैंक के करेंसी चेस्ट में मिली चार करोड़ रुपये की जाली करेंसी जैसा मान रही है।

बैंक की तरफ से इसे रुटीन प्रक्रिया बताया जा रहा है लेकिन एफआईआर इतने विलंब से क्यों की गई? इसके पीछे क्या खेल है? इसका स्पष्ट जवाब कोई नहीं दे पा रहा है।

एसएसपी प्रवीण कुमार का कहना है कि मामला पेचीदा है। जांच गंभीरतापूर्वक कराई जा रही है।

बैंक से रिकॉर्ड मांगे गए हैं। उधर,बैंक के प्रवक्ता का कहना है कि आईसीआईसीआई बैंक के चेस्ट में जाली करेंसी मिलने के बाद आरबीआई की गाइड लाइंस के मुताबिक रिपोर्ट दी जाती है।

सूबे में आईसीआईसीआई बैंक के लखनऊ व आगरा में दो करेंसी चेस्ट हैं। इनमें उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बैंक की लगभग 150 शाखाओं का पैसा जमा होता है।

लखनऊ के करेंसी चेस्ट में जाली करेंसी मिलने के बाद पड़ताल में पता चला है कि चेस्ट में आरबीआई के नियम-कानूनों का पालन नहीं हो रहा था।

जाली करेंसी पकड़ने के लिए आरबीआई ने सभी बैंक शाखाओं के अलावा करेंसी चेस्ट में एनएसएम (नोट सार्टिंग मशीन) लगाने के निर्देश दिए हैं।

आईसीआईसीआई बैंक के करेंसी चेस्ट में भी यह मशीन लगी है। इसमें नोटों की तीन स्तर पर जांच होती है। सबसे पहले नोटों की गिनती होती है।

इसके बाद सार्टिंग की जाती है, जिसमें कटे-फटे नोट अलग कर दिए जाते हैं। सबसे अंत में नोटों के असली-नकली होने की जांच होती है। अल्ट्रा वायलेट सिस्टम से नोटों के सभी सिक्योरिटी प्वाइंट्स देखे जाते हैं। नकली नोट मशीन अपने आप बाहर निकालकर फेंक देती है।

नियम यह है कि चेस्ट में आने वाली करेंसी की रोज जांच होनी चाहिए। जांच के बाद अधिकतम एक महीने में संबंधित थाना या कोतवाली में जाली करेंसी की एफआईआर करानी होती है। आईसीआईसीआई बैंक ने इस मामले में पूरी तरह से लापरवाही बरती।

डुमरियागंज से बड़ा मामला
आईसीआईसीआई बैंक के करेंसी चेस्ट में नकली नोट मिलने के मामले ने सिद्धार्थनगर के डुमरियागंज की याद ताजा कर दी।

जुलाई 2008 में एसटीएफ और यूपी पुलिस ने एक राष्ट्रीय बैंक के करेंसी चेस्ट से 4.02 करोड़ रुपये की जाली करेंसी पकड़ी थी। इस मामले में बैंक के एक कैशियर को गिरफ्तार किया गया था।
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चेस्ट में मिले सभी नोट 500 और 1000 के थे। डुमरियागंज प्रकरण के बाद ही तत्कालीन आरबीआई गर्वनर ने 26 अगस्त 2008 को डिप्टी गर्वनर ऊषा थोराट के नेतृत्व में हाई लेवल ग्रुप गठित किया था जो करेंसी नोट के वितरण और संग्रहण के इंतजाम के पर्यवेक्षण सहित तंत्र को मजबूत करने का काम कर रहा है।
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