‘साहब, मैं बहराइच का रहने वाला हूं। पापा की कई साल पहले मौत हो गई। घर में मां व छोटे भाई-बहन हैं।
मां मजदूरी करती है और मैं दो हजार रुपये में होटल पर बर्तन मांजता हूं। खाना व कपड़े होटल मालिक देता है।
मां हर माह आकर तनख्वाह ले जाती है। साहब मेरी नौकरी गई तो पूरा घर तबाह हो जाएगा’।
किसी फिल्मी कहानी-सी यह हकीकत नौ साल के उस बच्चे की है, जो चारबाग इलाके में एक होटल में काम करके परिवार का पेट पाल रहा था।
यह हकीकत उस समय उजागर हुई जब शनिवार को नाका हिंडोला पुलिस ने चारबाग इलाके में बालश्रम के खिलाफ अभियान चलाया।
इस दौरान पुलिस को वहां काम करते दस बच्चे मिले जिनमें से आठ लगभग ऐसी ही कहानी थी। छह बच्चों को उनके परिवारीजनों को सौंप दिया।
बालश्रम के खिलाफ सख्त आदेश के चलते इंस्पेक्टर नाका विजय प्रकाश सिंह शनिवार दोपहर फोर्स लेकर चारबाग क्षेत्र में जांच करने निकले।
होटलों, दुकानों व ठेलों पर काम करते नजर आए नौ बच्चों को मुक्त कराने के इरादे से थाने लाया गया। एक बच्चे ने पुलिस को चकमा देकर भागने की कोशिश की। सिपाहियों ने घेराबंदी करके उसे पकड़ा। म करते मिले बच्चों से उनके परिवार के बारे पूछताछ शुरू हुई तो उनकी कहानी सुनकर थाने में सन्नाटा छा गया।
कुछ पुलिसकर्मियों की आंखें नम हो चलीं तो कुछ बच्चों की मदद के लिए सोच में पड़े बुदबुदा रहे थे कि गरीबी जो न कराए कम है। कैसरबाग के मकबूलगंज निवासी दस वर्षीय बच्चे ने जानकारी दी कि पिता कई साल से दिमागी संतुलन खो चुके हैं।
मां और बहन आसपास के घरों में चौका बर्तन करती है। बड़ा भाई भी मजदूरी करता है और वह जैकेट बेचने वाले ठेले पर नौकरी करता है।
जहां से उसे डेढ़ हजार रुपये महीना मिलते हैं। बच्चे ने जोश के साथ कहा कि घर के सभी लोग काम करके पांच-छह हजार रुपये कमाते हैं।
पूरे परिवार के खाने में हर रोज सौ रुपये के हिसाब से तीन हजार खर्च हो जाते हैं। बचे तीन हजार में पापा की दवा और अन्य खर्चे पूरे करने होते हैं। पढ़ाई के सवाल पर बोला कि साहब नाम लिख लेता हूं। ज्यादा पढ़ने से भी कोई नौकरी मिलने वाली नहीं।
अपने पैरों पर खड़ा हूं और घर का खर्च चलाने में मां का हाथ बंटा रहा हूं। थोड़ी देर में बच्चे का मामा थाने पहुंचा। उसने उसके बयान की पुष्टि की।
इंस्पेक्टर ने बच्चे से काम न कराने की हिदायत देकर उसे मामा को सौंप दिया। एक होटल पर काम करते मिले दस साल के बच्चे ने पुलिस को बताया कि अपने मां-बाप को कभी देखा नहीं।
होश आया तो तन्हा था। फुटपाथ पर सो जाता हूं और दुकानों पर काम करके खर्च भर के रुपये कमा लेता हूं। काम बिगड़ने पर मालिक गाली देता है और पीटता है तो दूसरी दुकान पकड़ लेता हूं। अपना न कोई घर है न ठिकाना।
रात गहराने पर फुटपाथ पर जहां जगह मिली वहां को जाता हूं। मेरी तरह और भी बच्चे हैं। आपस में बात करके दुख हल्का कर लेते हैं। साहब बच्चों को नौकरी से न निकलवाइए। वरना,भूखे मर जाएंगे। इंस्पेक्टर ने इस बच्चे को चाइल्ड लाइन भेजने की तैयारी की।
बहराइच और बाराबंकी के तीन बच्चों की भी कुछ इसी तरह की कहानी थी। किसी की मां मर चुकी है तो किसी का पिता।
तंगहाली से जूझ रहे परिवार को घर के खर्च में हाथ बंटाने के लिए तीनों बच्चे लखनऊ पहुंचे और चारबाग के होटल व दुकानों पर काम शुरू किया।
घर वाले महीने में एक बार उनसे मिलने आते हैं। खास बात यह है कि उस वक्त वह अपने बच्चे को पुचकारने व उसकी खैरखबर लेने के बजाए उसके मालिक मेहनताना लेने आते हैं।
बच्चों को इसका दुख तो है लेकिन परिवार की मजबूरी से वाकिफ होने के चलते उसे गंभीरता से नहीं लेते। पुलिस ने तीनों के परिवार को बुलाया है।
चकमा देकर भागा मासूम
बच्चों को मुक्त कराने निकले इंस्पेक्टर विजय प्रकाश ने चारबाग में नौ साल के एक बच्चे से पूछताछ शुरू ही की थी कि वह चकमा देकर भाग निकला। मामला गड़बड़ नजर आने पर सिपाही उसके पीछे दौड़े और नत्था तिराहे के पास पकड़कर तलाशी ली। जेब में लोहे के दर्जन भर छर्रे निकले।
बच्चे ने खुद को बिहार का निवासी बताया। पुलिस को बच्चे के तार गाड़ी के शीशे तोड़कर बैग उड़ाने वाले गिरोह से जुड़े होने का शक हुआ।
छताछ में दो भाइयों के भी नाम कबूले। इसके बाद बिहार के ही एक व्यक्ति के बारे में जानकारी दी। पुलिस ने तीनों की तलाश शुरू की है।